व्यष्टि अर्थशास्त्र

प्रश्न :7 निगमन व आगमन विधियों का वर्णन करते हुए इनके प्रकार, गुण एवं दोष बताइये तथा दोनों विधियों में श्रेष्ठता के सम्बन्ध में प्रकाश डालिए।

उत्तर - निगमन व आगमन विधियाँ :

अर्थशास्त्र एक विज्ञान है । अन्य विज्ञानों की तरह से अर्थशास्त्र के भी अपने नियम एवं सिद्धान्त हैं, जिन्हें आर्थिक नियमों अथवा आर्थिक सिद्धान्तों के नाम से जाना जाता है । आर्थिक नियम. आर्थिक घटनाओं के कारण एवं परिणाम के बीच सम्बन्ध को व्यक्त करते हैं । आर्थिक नियमों के निर्माण के लिए कुछ विधियों का सहारा लेना पड़ता है । कोसा के अनुसार, “विधि” शब्द का अर्थ उस तर्कपूर्ण प्रणाली से होता है जिसका प्रयोग सच्चाई को खोजने अथवा उसे व्यक्त करने के लिए किया जाता हैं ।" आर्थिक नियमों की रचना के लिए जिन विधियों का । प्रयोग किया जाता है वे आर्थिक अध्ययन की विधियाँ कहलाती हैं। अर्थशास्त्र में इन विधियों का अत्यधिक महत्व होता है। बेजहाट के शब्दों में, “यदि आप ऐसी समस्याओं को बिना किसी। विधि के हल करना चाहते हैं तो आप ठीक उसी प्रकार असफल रहेंगे, जिस प्रकार एक असाधारण आक्रमण के द्वारा किसी आधुनिक सैनिक दुर्ग को जीतने में ।”

आर्थिक अध्ययन या आर्थिक विश्लेषण हेतु प्रायः दो विधियाँ अधिक प्रचलित हैं -

(1) निगमन विधि अथवा

(2) आगमन विधि

निगमन या अनुमान विधि

निगमन विधि आर्थिक विश्लेषण की सबसे पुरानी विधि है, जिसका आज भी अत्यधिक प्रयोग होता है । इस विधि के अन्तर्गत आर्थिक विश्व की सामान्य मान्यताओं अथवा स्वयंसिद्ध बातों को आधार मानकर तर्क की सहायता से निष्कर्ष निकाले जाते हैं। इस विधि में तर्क को क्रम सामान्य से विशिष्ट की ओर होता है । इस विधि को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। मनुष्य एक मरणशील प्राणी है' यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है । मोहन भी एंक मनुष्य है, इस तर्क के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मोहन भी ‘मरणशील' है । अब हम इसे अर्थशास्त्र के उदाहरण द्वारा स्पष्ट करेंगे। यह एक स्वयंसिद्ध बात है कि सभी मनुष्यों का व्यवहार सामान्यतया विवेकशील होता है। इसका अर्थ यह है कि सभी उपभोक्ता अपनी सन्तुष्टि को अधिकतम करना चाहते हैं अथवा सभी उत्पादक अपने लाभ को अधिकतम करना चाहते हैं। जब हमें यह ज्ञात है कि सभी उपभोक्ता अधिकतम सन्तुष्टि प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस सामान्य मान्यता अथवा स्वयंसिद्ध धारणा को आधार मानकर हम तर्क के आधर पर निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मोहन भी एक उपभोक्ता है और वह सन्तुष्टि को अधिकतम करना चाहता है । इस प्रकार स्पष्ट है कि निगमन विधि में हम सामान्य सत्यों के आधार पर तर्क द्वारा विशिष्ट सत्यों का पता लगाते हैं ।

प्रो. जे.के. मेहता के शब्दों में, “निगमन तर्क वह तर्क है जिसमें हम दो तथ्यों के बीच के कारण और परिणाम सम्बन्धी सम्बन्ध से प्रारम्भ करते हैं और उसकी सहायता से उस कारण का परिणाम जानने का प्रयत्न करते हैं, जबकि यह कारण अपना परिणाम व्यक्त करने में अन्य बहुत से कारणों से मिला रहता है।”

निगमन विधि को जेवन्स ने ज्ञान से ज्ञान प्राप्त करना' कहा है जबकि बोल्डिग ने इस विधि को ‘मानसिक प्रयोग की विधि' कहा है।

निगमन विधि के प्रकार :

निगमन विधि के दो प्रकार हैं (i) गणितीय तथा (ii) अगणितीय । गणितीय विधि का प्रयोग एजवर्थ तथा मिल ने अधिक किया था जबकि अगणितीय विधि का प्रयोग अन्य प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने अधिक किया था। वर्तमान में अर्थशास्त्र में रेखाचित्रों एवं गणित का प्रयोग बहुत अधिक होने लगा है। अधिकांश प्रतिष्ठित अर्थशास्त्र निगमन विधि के समर्थक रहे हैं।

निगमन विधि के गुण :

(1) सरलता- यह विधि अत्यन्त सरल है, क्योंकि इसमें आंकड़े एकत्रित करने एवं उनके विश्लेषण करने का जटिल कार्य नहीं करना पड़ता है। इस विधि में केवल कुछ स्वयंसिद्ध मान्यताओं को आधार मानकर तर्क की सहायता से विशिष्ट निष्कर्ष निकाले जाते हैं । इस विधि को सामान्य नागरिक भी सरलतापूर्वक समझ सकता है।

(2) निश्चितता- इस विधि के अन्तर्गत यदि स्वयंसिद्ध धारणाएं एवं मान्यताएं सत्य हैं तो उनके आधार पर निकाले गये निष्कर्ष निश्चित एवं स्पष्ट होते हैं। त्रुटियों को तर्क अथवा गणित की सहायता से दूर किया जा सकता है ।

(3) सर्वव्यापकता- इस विधि द्वारा निकाले गये निष्कर्ष सभी समयों व स्थानों पर लागू होते हैं, क्योंकि वे मनुष्य की सामान्य प्रकृति एवं स्वभाव पर आधारित होते हैं । सीमान्त उपयोगिता ह्रास नियम निगमन प्रणाली पर आधारित है और यह सिद्धान्त सभी स्थानों एवं समयों पर लागू होता है। निगमन विधि के निष्कर्षों को सभी प्रकार की आर्थिक प्रणालियों में लागू किया जा सकता है।

(4) निष्पक्षता- निगमन विधि के अन्तर्गत निकाले गये निष्कर्ष निष्पक्ष होते हैं, क्योंकि अन्वेषक निष्कर्षों को अपने विचारों तथा दृष्टिकोणों से प्रभावित नहीं कर सकता है। इस विधि में निष्कर्ष स्वयंसिद्ध मान्यताओं को मानकर तर्क के आधार पर निकाले जाते हैं । जहाँ पक्षपात-रहित सही निष्कर्षों की अधिक आवश्यकता होती है, वहाँ निगमन विधि का अधिक महत्व होता है ।

(5) आर्थिक विश्लेषण के लिए अधिक उपयुक्त- निगमन विधि आर्थिक विश्लेषण जैसे सामाजिक विज्ञान विषयों के लिए अधिक उपयुक्त होती है, क्योंकि मानवीय व्यवहार के सम्बन्ध में नियन्त्रित प्रयोग करना असम्भव अथवा अत्यन्त कठिन होता है । आर्थिक विश्लेषण की प्रयोगशाला समस्त विश्व होता है, अतः इतने बड़े क्षेत्र के बारे में आंकड़े एवं तथ्य एकत्र करना कठिन होता है। ऐसी स्थिति में निगमन विधि का प्रयोग अधिक उपयुक्त होता है ।

(6) मितव्ययी- निगमन विधि में आंकड़े एकत्रित करने तथा नियन्त्रित प्रयोग करने की आवश्यकता न होने के कारण अधिक व्यय नहीं करना पड़ता है । इसलिए यह विधि मितव्ययी है। इसलिए इसका प्रयोग व्यक्तिगत आधार पर भी किया जा सकता है। व्यक्तिगत अनुसन्धान व खोज के लिए यह विधि श्रेष्ठ है ।।

(7) आगमन विधि की पूरक- निगमन विधि का प्रयोग आगमन विधि द्वारा निकाले गए निष्कर्षों की जाँच करने के लिए किया जा सकता है। इस विधि का प्रयोग उन क्षेत्रों में भी किया जा सकता है जहाँ आगमन विधि का प्रयोग सम्भव नहीं होता है।

(8) भविष्यवाणी सम्भव- निगमन प्रणाली के आधार पर आर्थिक घटनाओं का पूर्वानुमान लगा कर भविष्यवाणी की जा सकती है।

निगमन विधि के दोष :

निगमन विधि में गुणों के साथ-साथ कुछ दोष भी देखने को मिलते हैं, जिनमें से कुछ निम्न हैं-

(1) निष्कर्ष काल्पनिक एवं अवास्तविक- इस विधि के अन्तर्गत निष्कर्ष तथ्यों एवं आंकड़ों को एकत्रित किए बगैर निकाले जाते हैं। ये निष्कर्ष सामान्य मान्यताओं के असत्य होने पर काल्पनिक एवं अवास्तविक होते हैं।

(2) निष्कर्ष की जाँच सम्भव नहीं- इस विधि में स्वयंसिद्ध तथ्य को जाँचने के लिए आंकड़े एवं सूचनाओं का प्रयोग नहीं किया जाता है। अतः न तो स्वयंसिद्ध मान्यताओं की ओर न ही उनके आधार पर निकाले गये निष्कर्षों की जाँच की जा सकती है।

(3) सभी आर्थिक समस्याओं का अध्ययन सम्भव नहीं- निगमन विधि के द्वारा उन आर्थिक समस्याओं का अध्ययन नहीं किया जा सकता है जिनके बारे में स्वयंसिद्ध मान्यताएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्व की नवीनतम समस्याओं, जिनके बारे में पूर्व अनुभव एवं स्वयंसिद्ध बातें ज्ञात नहीं हैं, का विश्लेषण इस विधि से नहीं किया जा सकता है।

(4) स्थिर दृष्टिकोण- निगमन विधि में निष्कर्ष कुछ स्वयंसिद्ध बातों को स्थिर मानकर निकाले जाते हैं, अतः यह स्थैतिक विश्लेषण है और इसमें प्रावैगिक दृष्टिकोण का अभाव पाया जाता है। विश्व की अधिकांश आर्थिक समस्याएं प्रवैगिक अथवा परिवर्तनशील हैं।

(5) सार्वभौमिकता का अभाव- आर्थिक परिस्थितियाँ समय तथा स्थान के साथ निरन्तर बदलती रहती हैं, अतः निष्कर्षों का सभी स्थान पर परिस्थितियों में प्रयोग नहीं किया जा सकता हैं।

आगमन विधि :

आगमन विधि निगमन विधि के ठीक विपरीत है । इस विधि में तर्क का क्रम विशिष्ट से सामान्य की ओर चलता है। इस विधि में बहुत-सी विशिष्ट घटनाओं अथवा तथ्यों का अवलोकन एवं अध्ययन करके प्रयोग के आधार पर सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं। जे.के. मेहता के शब्दों में, आगमन विधि तर्क की विधि है जिसमें हम बहुत-सी व्यक्तिगत आर्थिक घटनाओं के आधार पर कारणों और परिणामों के सामान्य सम्बन्ध स्थापित करते हैं।”

आगमन विधि को हम एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं। उदाहरणार्थ, हमने प्रयोग करके यह देखा कि किसी वस्तु का मूल्य गिरने पर 20 व्यक्ति उसे अधिक खरीदते हैं तो इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वस्तु का मूल्य गिरने पर उसकी माँग बढ़ जाती है । इस विधि में तर्क का क्रम विशेष से सामान्य की तरफ होता है ।

आगमन विधि के प्रकार :

आगमन विधि के दो प्रकार होते हैं-(i) प्रायोगिक आगमन विधि,तथा (i) सांख्यिकीय आगमन विधि।

प्रायोगिक आगमन विधि में कुछ नियन्त्रित प्रयोग किये जाते हैं और उनके आधार पर निष्कर्ष निकाले जाते हैं । अर्थशास्त्र जैसे सामाजिक विज्ञान में नियन्त्रित प्रयोगों के लिए बहुत कम क्षेत्र उपलब्ध होता है, इसलिए प्रयोगात्मक आगमन विधि का प्रयोग अर्थशास्त्र में बहुत सीमित मात्रा में ही किया जा सकता है।

सांख्यिकीय आगमन विधि के अन्तर्गत सम्बन्धित घटनाओं के बारे में विभिन्न क्षेत्रों के आंकड़े एकत्रित किये जाते हैं और उनका वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है, तथा सांख्यिकीय उपकरणों की सहायता से सामान्य निष्कर्ष निकाले जाते हैं। आर्थिक क्रियाओं के क्षेत्र में अधिक उपयुक्त होने के कारण अर्थशास्त्र में सांख्यिकीय आगमन विधि का प्रयोग अधिक होने लगा है।

आगमन विधि को अनेक नामों से पुकारा जाता है। यह विधि ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होने के कारण ऐतिहासिक विधि, वास्तविक तथ्यों पर आधारित होने के कारण वास्तविक प्रणाली, सांख्यिकीय आंकड़ों पर आधारित होने के कारण सांख्यिकीय प्रणाली, अनुभव द्वारा निकाले निष्कर्ष पर आधारित होने के कारण ‘अनुभव सिद्ध विधि' तथा वास्तविक प्रयोगों पर आधारित होने के कारण प्रायोगिक विधि के नाम से पुकारी जाती है । आगमन प्रणाली का प्रयोग रोसरनीज, मौलर, फ्रेडरिक, लिस्ट, लैस्ली आदि अर्थशास्त्रियों ने अधिक किया है।

आगमन विधि के गुण :

(1) निष्कर्षों का सही एवं विश्वसनीय होना- आगमन विधि में निष्कर्ष, वास्तविक तथ्यों, आंकड़ों एवं प्रयोगों की सहायता से निकाले जाते हैं, इसलिए ये निष्कर्ष वास्तविकता से अधिक निकट एवं विश्वसनीय होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को निष्कर्षों पर सन्देह हो तो वह स्वयं आंकड़े एवं तथ्य एकत्र करके पुनः निष्कर्ष निकाल सकता है।

(2) निष्कर्षों की जाँच सम्भव- इस विधि में निकाले गए निष्कर्षों को वास्तविक प्रयोगों, आंकड़ों एवं तथ्यों के आधार पर जाँचा जा सकता है। बार-बार निष्कर्षों की नए प्रयोगों से पुष्टि की जाती है तो इस विधि में जनता का अधिक-से-अधिक विश्वास हो जाता है।

(3) प्रवैगिक दृष्टिकोण- आगमन विधि प्रावैगिक दृष्टिकोण लिए हुए हैं। इस विधि में एक बार निकाले गए निष्कर्षों एवं सिद्धान्तों को सदैव के लिए सत्य नहीं माना जाता है ।

आर्थिक परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, अत: इस प्रणाली में बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार नवीन आंकड़े एकत्रित करके अथवा नवीन प्रयोग करके पुराने निष्कर्षों की जाँच की जा सकती है और उनमें आवश्यक संशोधन किया जा सकता है।

(4) निगमन विधि की पूरक- आगमन विधि के द्वारा हम उन निष्कर्षों की जांच कर सकते हैं जो निगमन विधि द्वारा निकाले गये हैं। अतः यह विधि निगमन विधि की पूरक है ।

(5) समष्टि आर्थिक विश्लेषण में अधिक उपयोगी- आगमन विधि समष्टि आर्थिक विश्लेषण में अधिक उपयोगी सिद्ध होती है। राष्ट्रीय आय, उपभोग, बचत एवं विनियोग के सम्बन्ध में हुम आंकड़े एकत्रित करके उनकी सहायता से विभिन्न प्रकार के आर्थिक सम्बन्ध ज्ञात कर सकते हैं और वांछित परिणाम प्राप्त करने के लिए आर्थिक नीतियों में संशोधन के सुझाव दे सकते हैं ।

आगमन विधि के दोष :

आगमन विधि में अनेक दोष पाये जाते हैं, जो अग्रलिखित हैं

(1) जटिल एवं कठिन- आगमन विधि में आंकड़ों को एकत्रित करना, उनका वर्गीकरण करना तथा विश्लेषण करना पड़ता है। अनेक बार इस विधि में नियन्त्रित प्रयोग भी करने होते हैं। ये सब प्रयोग अत्यन्त जटिल एवं कठिन होते हैं। एक सामान्य वृद्धि वाला व्यक्ति इस विधि की कार्य प्रणाली को सरलतापूर्वक नहीं समझ सकता है।

(2) पक्षपात का भय- आगमन विधि में एक अन्वेषक पक्षपात कर सकता है। वह अपनी विचारधारा के अनुरूप प्रयोग की इकाइयाँ चुन सकता है और इच्छित् निष्कर्ष निकाल सकता है। इसलिए कहा जाता है कि “आँकड़े कुछ भी सिद्ध कर सकते हैं और कुछ भी सिद्ध नहीं कर सकते ।” अन्वेषक निष्कर्षों को अपनी इच्छानुसार आवश्यक रूप दे सकता है।

(3) निष्कर्ष अनिश्चित - इस विधि द्वारा निकाले गए निष्कर्षों में अनिश्चितता की सम्भावना रहती है। स्वयं बोल्डिग ने माना है कि “सांख्यिक सूचना केवल ऐसी बातें या निष्कर्षों को प्रस्तुत कर सकती हैं जिनके होने की सम्भावना कम या अधिक होती है। वह पूर्णत: निश्चित निष्कर्ष नहीं दे सकती है।”

(4) खर्चीली- आगमन प्रणाली में निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए विभिन्न प्रकार के आंकड़ों का संग्रह एवं प्रयोग करना आवश्यक होता है । इस कार्य के लिए गणकों एवं अन्वेषकों को रखना पड़ता है, जिसमें अत्यधिक समय एवं धन का व्यय होता है। इसी कारण यह विधि अत्यधिक खर्चीली होती है ।

(5) सीमित क्षेत्र के अवलोकन पर आधारित निष्कर्ष दोषपूर्ण- आगमन प्रणाली के निष्कर्षों की सत्यता आंकड़ों एवं प्रयोगों के क्षेत्र पर निर्भर करती है। यदि बहुत थोड़े से आंकड़ों एवं प्रयोगों के आधार पर कोई निष्कर्ष अथवा सिद्धान्त प्रतिपादित कर दिये जाते हैं तो वे वास्तविकता से दूर होते हैं।

(6) अर्थशास्त्र जैसे सामाजिक विज्ञानों के लिए कम उपयोगी- अर्थशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है, जिसमें मानव व्यवहार पर नियन्त्रित प्रयोगों के लिए बहुत कम क्षेत्र होता है, इसलिए इसका आर्थिक विश्लेषण में अधिक प्रयोग नहीं हो सकता है।

(7) अर्थशास्त्र के विकास के लिए अपर्याप्त- यदि केवल इसी विधि का प्रयोग आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए किया जायेगा तो अर्थशास्त्र विषय का विकास रुक जायेगा क्योंकि अनेक समस्याएं इस विधि से हल नहीं की जा सकती हैं।

दोनों विधियों में श्रेष्ठता के सम्बन्ध में विवाद :

आर्थिक अध्ययन की दोनों विधियों के गुणों एवं दोषों का अध्ययन करके यह कहा जा सकता है कि आर्थिक अध्ययन में दोनों में से कोई भी अकेली विधि श्रेष्ठ नहीं है। दोनों । के ही कुछ गुण एवं कुछ अवगुण देखने को मिलते हैं । यद्यपि प्रतिष्ठित अर्थशास्त्रियों ने निगमन विधि को श्रेष्ठ बताया था तथा उन्होंने इस विधि का समर्थन किया था, क्योंकि (i) वे आर्थिक नियमों में अधिक निश्चितता लाना चाहते थे, (ii) वे अर्थशास्त्र एवं तर्कशास्त्र में गहरा सम्बन्ध मानते थे (iii) उस समय सांख्यिकी का विकास नहीं हुआ था, अतः आंकड़ों व सूचनाओं का अभाव था, तथा (iv) वे मानव व्यवहार पर प्रयोग सम्भव नहीं मानते थे, जबकि जर्मन ऐतिहासिक सम्प्रदाय के अर्थशास्त्रियों ने आगमन प्रणाली का समर्थन करते हुए इसे श्रेष्ठ बताया था क्योंकि (i) सांख्यिकी का विकास हुआ, तथा (ii) अर्थशास्त्रियों द्वारा व्यावहारिक प्रश्नों के हल करने की तीव्र आवश्यकता अनुभव की जाने लगी थी ।

परन्तु आज उपर्युक्त दोनों ही दृष्टिकोणों के विपरीत दोनों विधियों को ही अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए आवश्यक माना जाता है। आज अर्थशास्त्रियों का यह मत है कि दोनों विधियाँ एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं हैं, बल्कि दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं। इन दोनों विधियों के प्रयोग द्वारा ही हम सही तथा निश्चित निष्कर्ष प्राप्त कर सकते हैं । जहाँ दोनों का प्रयोग एक साथ हो सकता है वहाँ दोनों के प्रयोग द्वारा एक-दूसरे के निष्कर्षों की जाँच की जा सकती है। तथा ठीक निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है और जहाँ जिस एक ही विधि का प्रयोग हो सकता है, वहाँ उसी का प्रयोग किया जाना चाहिए। आर्थिक अध्ययन की इन विधियों में चुनाव की आवश्यकता नहीं है, बल्कि दोनों ही विधियों का प्रयोग आवश्यक है। मार्शल, बैगनर, कीन्स तथा श्मोलर जैसे अर्थशास्त्रियों ने अर्थशास्त्र के अध्ययन में दोनों ही विधियों को आवश्यक माना है। मार्शल ने ठीक ही कहा है “अन्वेषण की कोई भी एक ऐसी विधि नहीं है, जिसे अर्थशास्त्र के अध्ययन की उचित विधि कहा जा सके, वरन् प्रत्येक का यथास्थान अकेले या मिश्रित रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए।” श्मोलर का यह कथन जिसे मार्शल ने अपनी पुस्तक में उद्धृत किया है, इस विवाद को हल करने में अधिक सही नजर आता है। अर्थशास्त्र के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए निगमन एवं आगमन दोनों ही विधियों की उसी प्रकार की आवश्यकता है जिस प्रकार चलने के लिए दाँयें तथा बाँयें पैरों की आवश्यकता होती है ।” बैगनर ने इन दोनों विधियों के मध्य विवाद को समाप्त करते हुए लिखा है, "अर्थशास्त्र की विधियों के इस वाद-विवाद का वास्तविक हल निगमन तथा आगमन में से किसी एक के चयन में नहीं वरन्। निगमन एवं आगमन दोनों की स्वीकृति में है।”

निष्कर्ष- आज निगमन एवं आगमन विधियों के मध्य चुनाव अथवा दोनों में से किसी एक की श्रेष्ठता का विवाद समाप्त हो गया है तथा दोनों ही विधियों को अर्थशास्त्र के अध्ययन में आवश्यक समझा जाता है ।


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