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तीन अपाहिज एकांकी का उद्देश्य क्या है |

तीन अपाहिज एकांकी का उद्देश्य- अपाहिज अतार्थ विकलांग
समाज आज विकलांगता के दौर में पहुँच गया है। विपिन कुमार अग्रवाल ने इस एकांकी में तीन पात्रों को माध्यम बनाया है-कल्लू गल्लू और खल्लू। तीनों का अपना अस्तित्व तो है। पर, यह अस्तित्व शारीरिक है। सामाजिक दायित्व, नैतिकता, सक्रियता यहाँ सभी कुछ नदारद है। लेखक का मूल उद्देश्य है इस देश की तथा कथित आजादी के वास्तविक चित्र को प्रस्तुत करना। लेखक को लगता है आज की जनतांत्रिक व्यवस्था तमाम विसंगतियों के चलते मुँह चिढ़ा रही है। समाज के बहुत बड़े वर्ग की निष्क्रियता, अर्थहीनता,विभ्रमता,थकान आदि इस समाज और देश को सामूहिक विकलांगता की ओर धकेल रहे हैं।
यह एकांकी 'एब्सङ' कोटि की नाट्यरचना मानी जाती है। यहाँ अनिश्चितता और असंबद्धता हावी है। लगातार बेतुकापन, ऊल जुलूल घटित होना, कहीं भी कुछ भी व्यवस्थित न दीखना इसे बड़ी अजनबी पन देते हैं। लगता है असंगतता और बेतुकापन इस समाज की नियति बन गए हैं। लोग इन्हें औजार के रूप में प्रयोग करने लगे हैं।
इस एकांकी में तीन पात्र हैं। तीनों एक-दूसरे से संवाद करते हैं। यह संवाद तारतम्यहीन है। दर्शकों के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। फिर भी, उन्हें निरन्तर यह आभास होता रहता है कि इसमें कुछ है जो हमारे आसपास घटित हो रहा है। आजादी के मायने, नेताओं की फिजूल भाषणबाजी, भारतीयता, अपना देश, भाषा, वर्ग, सभी पर बहस होती है और लगता है सभी कुछ जरूरी होने पर भी निरुद्देश्य। वस्तुतः लेखक यह दिखाना चाहता है कि आधुनिक होने की प्रक्रिया में समाज अपना मानवीय स्वरूप भूल रहा है। औद्योगिकीकरण की जद्दोजहद में हम सब कुछ भूल रहे हैं। जिन्दगी के चारों ओर इतनी विसंगति पसर गई है कि हम स्वयं उनके बीच पिस रहे हैं। इस प्रकार देश की थकान, निष्क्रियता, निरुद्देश्यता तथा जिम्मेदारी से भागने के रूप में दिखाना ही लेखक का उद्देश्य है।