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प्रश्न 3 : राजा भोज द्वारा लिखित धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र एवं वास्तुशास्त्र ग्रन्थों पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- धर्मशास्त्र पर भोजदेव कृत ‘पूर्तमार्तण्ड' नामक ग्रंथ है। इसके अतिरिक्त उन्होंने धर्मशास्त्र सम्बन्धी और ग्रंथ भी लिखे होंगे, क्योंकि इसका उल्लेख अनेक सुप्रसिद्ध धर्मशास्त्र ग्रंथकारों ने अपने ग्रंथों में किया है। दक्षिण कल्याणपुर के चालुक्यवंशी प्रसिद्ध राजा विक्रमांकदेव के मंत्री भट्टविज्ञानेश्वर (108 ई.) ने याज्ञवल्लक्यस्मृति पर मिताक्षरी व्याख्या की है।

नीतिशास्त्र-भोजदेव ने 'चाणक्य राजनीतिशास्त्र' नामक ग्रंथ भी लिखा।

प्राचीन शिल्पशास्त्रज्ञ स्व. रायसाहब कृष्णाजी विनायक बझे शिल्प कालनिध ने भी लिखा है कि यह ग्रंथ अत्यन्त उपयोगी है और प्राचीन शास्त्री की दृष्टि से शिल्प सम्बन्धी बातों का अच्छा वर्णन है। ग्रंथ के प्रत्येक अध्याय के अन्त में ‘‘इति श्री महाराजाधिराज भोज़देव विरचिते समरांगणसूत्र धारापरनाम्नि वस्तुशास्त्रे.... नाम....अध्याय लिखा है। छपे हुए ग्रंथ में 83 अध्याय हैं, परन्तु ज्ञात होता है कि ग्रंथ अपूर्ण है।

राष्ट्रोपयोगी शास्त्रविद्या और कला-सम्बन्धी ग्रंथ राष्ट्र और समाज की उन्नति के लिए उपकारक और आवश्यक हैं, इन पर भी भोजदेवकृत ग्रंथ मिलते हैं। भोजदेव रचित युक्ति कल्पतरु (Enoyelopaedia) नाम का एक ग्रंथ है, जो विश्व ज्ञानकोष के समान है। इसमें राष्ट्रोपयोगी अनेक विषयों को संक्षेप में समावेश किया गया है। आरम्भ में मंगलाचरण के पश्चात् लिखा है

नानामुनिनिबंधानां सारमाकृष्ययत्रतः।

तनुते भोजनृपतिर्युक्तिकल्प मुदे॥

अनेक ग्रंथों को सार लेकर भोजदेव ने इस युक्ति कल्पतरू की रचना की है। युक्तिकल्पतरू नाम अत्यन्त व्यापक है। राज्यकर्ता के लिए आवश्यक बातें तथा राज्य को दृढ़ बनाने की अनेक युक्तियों का संचय यह कल्पतरू ही है। इसमें राज्य-व्यवस्था, मंत्री तथा दूतों के भेद और लक्षण, राजनीतिक संधि विग्रह, सेना आदि के भेद और देशानुसार उनका महत्व, युद्ध करने की युक्तियाँ, प्रकारादि का महत्व और उनके निर्माण करने की रीति, ध्वजा, पताका छत्र, चामरादि अनेक राज-चिन्हों सिंहासनों और रत्नमणि अलंकारादि की। परीक्षा, नीति और युद्धोपयोगी शास्त्रास्त्रे तथा उनकी परीक्षा, रथ, पालकी इत्यादि सवारियाँ

और नौका इत्यादि राष्ट्रोपयोगी अनेक विषयों को पुराण आदि ग्रंथों से आवश्यक ज्ञान प्राप्त करके वर्णन किया गया। इसके अतिरिक्त इस ग्रंथ में एक नवीनता यह भी है कि उपर्युक्त प्रत्येक विषय का वर्णन करते समय भोजदेव ने स्वरचित अन्य ग्रंथों के उदाहरण भी दिए। हैं। इससे जान पड़ता है कि भोजदेव ने प्रत्येक विषय पर पृथक्-पृथक् ग्रंथ लिखे होंगे।


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