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प्रश्न :1 'राजा भोज एक अच्छे शासक होने के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे'- स्पष्ट कीजिए।

उत्तर : भोज परमार की उपलब्धियाँ सर्वाधिक विख्यात परमार नरेश भोजदेव प्राचीन भारत के महानतम् राजाओं में से एक था। सिंधुराज की मृत्यु के बाद 1050 ई. में उसका पुत्र भोज राजा बना। 15 वर्ष की आयु में मालवा के परमार शासन की गद्दी पर बैठा। राजा भोज परमार वंश का एक शक्तिशाली तथा अपने युग का महान प्रतापी राजा था। जिसे मालवा के लोग राजा भोज के नाम से आज भी जानते हैं। राजा भोज सर्वगुण सम्पन्न एवं प्रतिभाशाली सम्राट था। उसने अपने शासनकाल में अनेक अद्भुद निर्माण कार्य एवं जनजीवन के कल्याण के अनेक प्रशंसनीय कार्य किये इसलिए इसकी चर्चा मालवांचल के लोकजीवन, लोककथाओं में आज भी हर क्षेत्र में शामिल हैं।

राजा भोज ने कलचुरी नरेश गांगदेव एवं इन्द्रप्रस्थ को भी पराजित किया था। राजा भोज का कुछ समय कन्नौज पर भी आधिपत्य होने के अभिलेखीय प्रमाण मिलते हैं। भोज के साम्राज्य की सीमा में पश्चिमी बिहार के कुछ भाग भी शामिल हो गये थे। कन्नौज और उसके आसपास के प्रदेश के क्षेत्रों का नाम भोजपुर पड़ गया था। यहाँ तक भी अपुष्ट जानकारी मिलती है कि राजा भोज ने महमूद गजनवी को भी प्रारम्भिक तौर पर हराया था। राजा भोज एक महान सैनिक एवं सेनापति था इसलिए उसने अपने पड़ौसी राज्यों के राजाओं को अपना व परमारों का लोहा मनवाया था। इसी क्रम में उसने धार के राजा कीर्तिराज और गुजरात के राजा  भीम सोलंकी को भी कई बार बुरी तरह पराजित कर उसके अन्हिलवाड़ा क्षेत्र को बुरी तरह लूटा था। जिससे त्रस्त होकर भीम सोलंकी ने कलचुरी नरेश लक्ष्मीकर्ण के साथ एक राजनैतिक संघ बनाकर लगभग 1060 ई. में भोज के मालवा साम्राज्य पर दो तरफ से आक्रमण कर दिया। इसी युद्ध के चलते मालवा राजा भोज की मृत्यु होना साबित होती है। जब राजा भोज की मृत्यु हो गई तब इन आक्रमणकारियों ने मालवा की राजधानी धार नगरी को खूब लूटा।

राजा भोज की मालवा में लोकप्रियता व प्रसिद्धि, मात्र उसके साम्राज्य विजय अभियानों में सफलता और विस्तार के कारण ही नहीं थी बल्कि उसके कुशल सुप्रशासन, न्यायप्रियता, विद्यानुरागिता व कलाप्रियता जैसे असंख्य कारण भी थे। वह सच्चा प्रजापालक सम्राट था। इसीलिए उसकी लोकप्रियता का डंका मालवा के अतिरिक्त देश के सुदूर अंचलों में भी बजता था।

राजा भोज ने अपने शासनकाल में लगभग 84 ग्रंथों की रचना करवाई थी इनमें विविध विषय थे। इससे स्पष्ट होता है कि वह परमार शासकों में कला एवं साहित्य का महान् संरक्षक शासक था। अपने शासनकाल में अपनी राजधानी धार में उसने एक संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना भी की थी, जहाँ पर देश के कई प्रांतों एवं राज्यों से विद्यार्थी ज्ञान अर्जित करने आया करते थे। राजा भोज ने 1034-35 में अपनी राजधानी धार नगरी में एक भोज शाला का निर्माण भी करवाया था। यहाँ हिन्दू जीवन दर्शन संस्कृति एवं संस्कृत भाषा के प्रचार प्रसार हेतु माँ सरस्वती वाग्देवी का मंदिर भी निर्मित करवाया। जहाँ पर 1035 के बसंत पंचमी के दिन में सरस्वती जन्मोत्सव तक बनाने के प्रमाण मिलते हैं। जिसमें देश विदेश से 1400 प्रख्यात विद्वानों, संतों और धर्माचार्यों ने भाग लिया था। इसी दिन वाग्देवी की प्रतिमा की प्राणप्रतिष्ठा भी की गई थी। जो राजा भोज के बाद परमार शासकों व 16वीं शताब्दी तक मालवा की संस्कृति एवं हिन्दू दर्शन का केन्द्र बिन्दु बना। रहा। जब 1305 में यह केन्द्र अलाउद्दीन खिलजी के मालवा अभियान के दौरान निशाने पर आया तब उसकी सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु तत्कालीन मालव-परमार नरेश महलकदेव एवं उसके सेनापति गोगादेव ने अलाउद्दीन के साथ सामना करते हुए अपने जीते जी भोजशाला को छूने नहीं दिया। सन् 1514 ई. में मेहमूद शाह खिलजी द्वारा इस भोजशाला को खंडित कर उसे मस्जिद के रूप में परिवर्तित कर दिये जाने के प्रमाण मिलते हैं। आज यह भोजशाला प्रजा एवं प्रशासन केबीच विवाद का विषय बना है। जिस पर शासन प्रशासन अपना दो टूक निर्णय देने में हिचकिचाते हैं। यहीं सूफीसंत कमाल मोलाना चिश्ती की दरगाह 1500 में स्थापित की गई। यहाँ न तो किसी मस्जिद या मंदिर के ऐतिहासिक भग्वनावशेष मिलते हैं और न ही प्रमाण है। बस इसे धर्मान्ध सुल्तानों ने धर्मस्थल में बदलकर सर्वधर्म सम्भाव का सुंदर, सजीव एवं सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। बस हिन्दू पाठशाला के मुद्रण तथा मुसलमान सूफीसंत मौलाना चिश्ती की दरगाह के कारण लोग अपना-अपना धर्म स्थल मान बैठे हैं।

राजा भोज सच्चा शिवभक्त सम्राट था। इसलिए उसने अपने राज्य में अनेक मंदिरों का निर्माण भी कराया था। वर्तमान भोपाल से दक्षिण-पूर्व में उसे एक विशाल झील का निर्माण करवाया था जो लगभग 250 वर्गमील के क्षेत्र में फैली हो, इसी के निकट उसने अपने नाम के तुल्य वर्तमान भोपाल नगर भी बसाया था। जो भोजपाल का अपभ्रंश है।

राजाभोज के बाद उसका पुत्र जयसिंह मालवा का परमार शासक हुआ। उसने अपने पिता के शत्रुओं को (कलचुरी एवं सोलंकी) चालुक्य नरेश सोमेश्वर से सहयोग प्राप्त कर मालवा से खदेड़ कर मालवा पर पुन: परमारों के आधिपत्य जमा लिया था। कुछ ही समय बाद मालवा पर चालुक्यों एवं गुजरात के शासकों का अधिपत्य हो गया, ऐसी दशा में राजा भोज के चचेरे भाई उदयादित्य ने शाकम्भरी के चौहान शासकों से सहयोग प्राप्त करते हुए इन आक्रांताओं को मालवा से पुनः खदेड़ दिया।

उदयादित्य के कई पुत्र थे जिनमें आपस में भाईयों के प्रति अटूट श्रद्धा थी। इसलिए उसके बड़े पुत्र जगदेव ने 1112 ई. के लगभग अपने छोटे भाई नरवर्मन के पक्ष में स्वतः गद्दी त्याग कर चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्टम के दरबार में नौकरी करने चला गया।

नरवर्मन के बाद मालवा के परमार शासकों की परम्परानुसार यशोवर्मन 1133 में इसका उत्तराधिकारी हुआ जिसे गुजरात के शासक जयसिंह सिद्धराज ने चौहान शासक से सहायता प्राप्त कर बंदी बना लिया तथा उसने उज्जैन प्रांत पर अधिकार कर लिया।

मालवा के परमार शासकों का गुजरात पर भी अधिकार 12वीं शताब्दी के 4th वें दशक तक बना रहा। इसके बाद चालुक्यों ने विन्धयवर्मन के सहयोग से परमारों को पराजित कर पुन: मालवा पर अधिकार कर लिया परन्तु 12वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों 1193 में वह कमजोर हो गया व उसकी राज सीमा घटने लगी।

विन्ध्यवर्मन की मृत्यु के बाद देवपाल परमार, मालवा का शासक बना। इसी के शासनकाल में सन् 1233-34 में इल्लुतमिश ने अपनी मालवा विजय के दौरान विदिशा, रायसेन और उज्जैन को भी जीतते हुए लूटा था। पर उसकी यह विजय अस्थाई रही। इसके बाद विभिन्न परमार शासक ही मालवा पर शासन करते रहे। 1305 में महलक देव को अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति एनुल-मुल्क-मुल्तानी ने पराजित कर मार डाला था। यहीं से मालवा में परमारों की शक्ति का अन्त आरंभ होना माना जाता है।


परमार शासक भोज की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए भोज परमार वंश का सबसे महान् शासक था। विवेचना कीजिए