entrepreneurship-development

1. उधमिता से क्या आशय है ? उधमिता की विशेषताओं का वर्णन करें |

उत्तर : उधमिता का अर्थ : किसी नये व्यवसाय को आरम्भ करने तथा उसका संचालन करने में पर्याप्त जोखिम एवं कड़े प्रयत्न शामिल होते हैं। यह जडता के विरुद्ध कुछ नया करने का प्रयत्न होता है। यह जोखिम हटाने की क्षमता, संसाधनों को उत्पादक कार्यों में लगाने के प्रयास , नये विचारों का कार्य रूप देने की ललक एवं भावी चुनौतियों को लाभ उठाने के अवसर प्राप्त करना उद्यमशीलता के गुणों पर निर्भर करता है।
उद्यमशीलता के कारण नही सिर्फ नवीन रोजगार अवसरों का सृजन होता है, वरन् अर्थव्यवस्था को गति प्राप्त होती है एवं राष्ट्र के संसाधनों का समुचित दोहन होता है। उधमिता शब्द, अन्य आर्थिक शब्दों की ही तरह काफी बहस व विचारों का केन्द्र बना है।

विभिन्न लेखक ने इसे विभिन्न तरह से परिभाषित किया है । कुछ ने इसे "जोखिम उठाने की क्षमता " माना है,तो कुछ ने "नव-प्रवर्तन योग्यता" से जोड़ा है तथा कुछ ने इसे प्रबंधकीय क्षमता एवं संगठन निर्माण की योग्यता माना है।
उधमिता की परिभाषाएँ वैसे तो कई विद्वानों ने उधमिता के बारे में अपने विचार व्यक्त किये हैं, लेकिन उनमें से निम्न परिभाषाएँ महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं |

फ्रेंकलिन लिंडसे के शब्दों में-“उधमिता समाज की भावी आवश्यकताओं का पूर्वानुमान करने एवं संसाधनों के नवीन, सृजनात्मक तथा कल्पनाशील संयोजनों के द्वारा इन आवश्यकताओं को सफलता पूर्वक पूरा करने का कार्य है । "

जोसेफ शुम्पीटर के मतानुसार - "उधमिता एक नव-प्रवर्तनकारी कार्य है।यह स्वामित्व की अपेक्षा एक नेतृत्व कार्य है।”

एच.डब्ल्यू. जॉनसन के अनुसार -“उधमिता तीन आधार भूत तत्वों का जोड़ है -अन्वेषण ,नव-प्रवर्तन तथा अनुकूलन। ”

जे. इ. स्टेपनेक के शब्दों में-“उधमिता किसी उपक्रम में जोखिम उठाने की क्षमता , संगठन की योग्यता एवं विविधीकरण करने तथा नव-प्रवर्तनों को जन्म देने की इच्छा है।”


उपर्युक्त परिभाषाओं के अध्ययन तथा विश्लेषण के आधार पर उधमिता की एक उपयुक्त परिभाषा निम्न तरह से दी जासकती है
उपयुक्त परिभाषा -“उधमिता व्यवसाय में विभिन्न जोखिमों को वहन करने,लाभप्रद साहसिक निर्णय लेने , सामाजिक नव-प्रवर्तन करने एवं गतिशील नेतृत्व प्रदान करने की योग्यता है। ”
इस तरह इन विद्वानों के विचारों में उधमिताया साहसिकता ही वर्तमान युग का सर्वाधिक महत्व पूर्ण योग्यता होती है, क्योंकि इस बदलते परिवेश में उधमिता द्वारा ही आर्थिक तथा औद्योगिक प्रगति लाई जा सकती है।

उधमिता की विशेषताएँ निम्नानुसार हैं

1.जोखिम उठाने की क्षमता-प्रत्येक व्यवसाय में बल्कि सही मायनों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मेंजोखिम निहित होती है। व्यवसाय में आर्थिक संसाधनों का संयोजन कर उत्पादन कार्य किया जाता है, पर इसमें अनिश्चितताएँ होती हैं एवं वही अनिश्चितताएँ जोखिम को जन्म देती हैं।जोखिम से प्रभावी ढंग से नहीं निपटने पर व्यवसाय समाप्त भी हो सकता है। उधमिता में जोखिम वहन करने की क्षमता होती है। कुछ व्यावसायिक जोखिमों से बीमा करा कर बचा जा सकता है, जबकि अन्य जोखिमों को उद्यमी के अनुभव व योग्यता के आधार पर उठाया जाता है।
2. निरंतर प्रक्रिया उधमिता अपने आप में एक निरंतर प्रक्रिया है। सिर्फ नवीन व्यवसाय को प्रारंभ करना ही उधमिता नहीं है, वरन् उसका दक्षता पूर्ण संचालन करना, व्यवसाय को विकास की तरफ अग्रसर करने जैसे लंबी अवधि के लक्ष्य पाना एवं दिन-प्रतिदिन के निर्णय लेने की प्रक्रिया आदि उधमिता में ही समाहित है।
3. उधमिता एक आचरण है-उधमिता एक व्यक्तिगत गुण नहीं है, वरन् आचरण का परिणाम होती है। व्यवसाय के विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने की आवश्यकता होती है, पर निर्णय लेने में जोखिम निहित होती है, जिसे अनुभव द्वारा ही वहन किया जा सकता है। एक निरंतर प्रक्रिया होने के कारण उधमिता आचरण का हिस्सा बन जाती है।
4. नव-प्रवर्तन की योग्यता-नव-प्रवर्तन अर्थात कुछ नया करना। नव-प्रवर्तन को वास्तविक स्वरूप उधमिता के जरिये ही दिया जा सकता है।
5. सभी कायों में आवश्यक-जीवन के सभी क्षेत्रों में उधमिता की जरूरत होती है। प्रत्येक क्षेत्र में जोखिम उठाने, नव-प्रवर्तन करने, प्रबंध करने की आवश्यकता होती है। न सिर्फ व्यवसाय बल्कि राजनीति, प्रशासन, खेलकूद, चिकित्सा, सेना, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में साहसी निर्णय लिये जाते हैं। उद्यमशील व्यवहार के व्यक्ति इन क्षेत्रों में भी सफलता प्राप्त करते हैं।
6. उधमिता अर्जित कार्य है-उधमिता स्वाभाविक रूप से संगठन में विद्यमान नहीं होती, वरन प्रयास द्वारा अर्जित की जाती है। प्रत्येक व्यावसायिक संगठन में उधमिता नहीं होती, वरन साहसिक निर्णयों द्वारा उधमिता को व्यवहार में लाया जाता है। इसके लिये उद्यमी को लगातार प्रयत्न करने होते हैं।
7. संसाधनों का संयोजन तथा उपयोग-उधमिता द्वारा यत्र-तत्र बिखरे संसाधनों को संयोजित कर दक्षता पूर्वक उपयोग किया जाता है। वर्तमान समय में उत्पादन के विभिन्न साधन यथा-भूमि, श्रम, पूँजी, संगठन आदि विभिन्न व्यक्तियों के पास होते हैं। उद्यमी इन संसाधनों को एकत्रित करता है तथा उनमें संयोजन कर उत्पादन प्रक्रिया आरंभ करता है।
8. पेशेवर प्रक्रिया-वर्तमान समय में उधमिता एक पेशे के रूप में विकसित हो रहा है। चिकित्सा, विधि, इंजीनियरिंग, प्रबंध आदि पेशों की तरह उधमिता की योग्यता को शिक्षण, प्रशिक्षण द्वारा विकसित किया जा रहा है। शासन तथा कई अन्य संस्थाएँ, उधमिता विकास की योजनाओं द्वारा व्यक्तियों को व्यवसाय प्रारंभ करने एवं उसका सुचारु संचालन करने में मदद कर रही हैं।
9. रचनात्मक प्रक्रिया-उधमिता नव-प्रवर्तन का परिणाम होती है तथा नव-प्रवर्तन की प्रेरणा रचनात्मक विचारों और कार्यों से मिलती है।
10. परिणाम जनित व्यवहार-कोई भी उद्यमी हो, उसे अपने निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु ही कार्य करना होता है, अतः उधमिता सदैव परिणामों को महत्व देती है, भाग्य को नहीं। उद्यमी व्यक्ति अपने प्रयासों तथा परिश्रम के द्वारा परिणाम प्राप्त करने में भरोसा करते हैं। वे अपने सुदृढ़ निर्णयों, ठोस योजनाओं तथा लक्ष्य जनित व्यवहार के द्वारा उपलब्धियाँ प्राप्त करने में ही विश्वास रखते हैं।
11. प्रबंध उधमिता का माध्यम है-किसी भी व्यावसायिक इकाई में प्रबंध ही समस्त साहसिक निर्णयों तथा योजनाओं के क्रियान्वयन का माध्यम है। प्रबंध के द्वारा ही साहसी अथवा उद्यमी अपने मूल लक्ष्यों की प्राप्ति की योजना को अमल में लाने का प्रयास करता है।


BU BHOPAL, 2018