Botany वनस्पति विज्ञान

प्रश्न 23 : निम्नलिखित पर फलों के पकने की क्रियाविधि संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये-

उत्तर- फलों के पकने की क्रियाविधि (Mechanism of Fruit ripening)- फल की वृद्धि प्रावस्था पूर्ण होने के पश्चात् इसमें अनेक लाक्षणिक जैव- रासायनिक परिवर्तन होते हैं, इन परिवर्तनों को सामूहिक रूप से फल का पकना अथवा फल परिपक्वन (fruit ripening) कहते हैं। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप फल नरम, वर्णकों युक्त तथा खुशबूदार तथा खाने योग्य हो जाता है। फल परिपक्वन के समय प्राकृतिक अव्युत्क्रमणीय कालप्रभावन बाद की प्रक्रिया होती है। अनेक फलों में यह प्रक्रिया पादप से फल तोड़े जाने के तुरन्त बाद प्रारम्भ होती है जबकि कुछ अन्य में यह प्रक्रिया पादप पर संलग्न अवस्था में ही प्रारम्भ हो जाती है।

फल परिपक्वन के समय होने वाली विभिन्न जैवरासायनिक। क्रियाएँ निम्न प्रकार हैं -

(i) क्लाइमैक्ट्रिक श्वसन (Climactric respiration)- अनेक फलों के परिपक्वन के समय श्वसन दर में व्यापक वृद्धि देखने को मिलती है जिसे क्लाइमैक्ट्रिक श्वसन कहते हैं।

किड तथा वेस्ट (Kid and Wast, 1930) के अनुसार सेब के फलों में वृद्धि के दौरान श्वसन दर स्थित रहती है तथा परिपक्वन के समय श्वसन दर में तेजी से वृद्धि होती है। श्वसन दर एक उच्चतम स्तर क्लाइमेक्ट्रिक शिखर पर पहुँचने के पश्चात् पुनः धीमी हो जाती है। विभिन्न जातियों में क्लाइमेक्ट्रिक शिखर की समयावधि का मान भिन्नभिन्न होता है। उच्च O2 सान्द्रुत्वा तथा न्यून CO2 सान्द्रता क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि को प्रेरित करते हैं इसके विपरीत उच्च CO2 व न्यून O2 सान्द्रता में क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि नहीं हो पाती है जिससे फलों को लम्बे समय तक संगृहीत रखा जा सकता है। क्लाइमेक्ट्रिक फलों के प्रमुख उदाहरण है— केला, सेब, नाशपाती, टमाटर व आम आदि।

कुछ फलों में परिपक्वन के दौरान श्वसन दर स्थिर बनी रहती है। अर्थात् क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि का अभाव होता है। इस प्रकार के फल अक्लाइमेक्ट्रिक फल कहलाते हैं जिसके प्रमुख उदाहरण हैं—चेरी, अंजीर, नींबू व संतरा आदि।

क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि से पूर्व अथवा क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि के समय फलों में तेजी से इथाइलीन का उत्पादन बढ़ जाता है। श्वसन की क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि को इस सन्दर्भ में देखा जाता है कि यह परिपक्वन के लिए आवश्यक ऊर्जा की पूर्ति के लिए आवश्यक होती है।

(ii) एन्जाइम सक्रियता (Enzyme activity)- फलों के परिपक्वन के समय अनेक जल-अपघटनकारी एन्जाइम्स की सक्रियता में वृद्धि होती है। पॉलीगेलेक्टूरोनेज (polygalacturonase), पेक्टिन मिथाइल एस्टेज (pectin methyl estrase) तथा सेल्यूलोज (cellulose) नामक एन्जाइम्स की सक्रियता के फलस्वरूप फल नरम तथा स्वादयुक्त हो जाते हैं। अनेक फलों में मिठास स्टार्च के घुलनशील शर्करा में अपघटन तथा सूक्रोज के संश्लेषण के फलस्वरूप उत्पन्न होता है। कुछ फलों में लाइपेज की सक्रियता से वसा अम्लों का संचयन होता है। इनके अतिरिक्त एन्जाइम विभिन्न पदार्थों के विघटन द्वारा एस्टर (ester), ऐल्डिहाइट (aldehyde) तथा कीटोन्स (ketones) का निर्माण भी करते हैं जिससे इनमें खुशबू उत्पन्न हो जाती है।

(iii) आर.एन.ए. उपापचय (RNA Metabolism)- अनेक फलों में परिपक्वन के समय RNA संश्लेषण में वृद्धि हो जाती है। केले में क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि के प्रारम्भ में RNA की मात्रा 50% तक बढ़ जाती है जो अल्पकाल तक रहती है तथा क्लाइमेक्ट्रिक शिखर के पश्चात् पुनः कम हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि RNA संश्लेषण परिपक्वन के लिए आवश्यक होता है क्योंकि एक्टिनोमाइसिन-D (जो RNA ट्रांसक्रिप्शन का संदमक है) की उपस्थिति में फलों का परिपक्वन संदमित हो जाता है।

जिन फलों में परिपक्वन के प्रारम्भ में RNA की मात्रा में वृद्धि होती है उनमें प्रोटीन की मात्रा में भी वृद्धि देखी गई है। प्रोटीन की मात्रा में वृद्धि प्रोटीन संश्लेषण के फलस्वरूप होती है जो कुछ फलों के परिपक्वन के लिए आवश्यक होती है।

(iv) वर्णक निर्माण (Formation of pigments)- फलों के परिपक्वन के समय वर्णक संगठन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन होता है। उदाहरण के लिए टमाटर के फलों में परिपक्वन के दौरान विभिन्न रंग इस क्रम में प्रकट होते हैं : हरा → श्वेत → पीला → नारंगी → लाल। हरे रंग से श्वेत में परिवर्तन क्लोरोफिल के अपघटन के कारण होता है। जबकि मध्यवर्ती रंग (पीला, नारंगी) । विभिन्न केरोटीनॉयड्स के प्रकट होने के कारण तथा परिपक्व फलों में लाल रंग लाइकोपिन नामक केरोटीनॉयड्स के प्रकट होने के कारण तथा परिपक्व होते फलों में लाल रंग लाइकोपिन नामक केरोटीन के कारण होता है। इस प्रकार परिपक्व होते फलों में क्लोरोप्लास्ट्स का परिवर्तन क्रोमोप्लास्ट्स (chromoplasts) में हो जाता है। इस क्रिया के दौरान क्लोरोप्लास्ट के थाइलेकोइड्स में क्लोरोफिल का ह्रास हो जाता है तथा केरोटीनॉयड्स का निर्माण हो जाता है।

चेरी, बेरी तथा स्ट्राबेरी जैसे फलों में परिपक्वन के दौरान केरीटीन. की बजाय एन्थोसाइनिन (anthocyanine) वर्णकों का संश्लेषण होता है। एन्थोसाइनिन जल विलेय वर्णक होते हैं जिनका निर्माण प्लास्टीड्स से बाहर होता है तथा ये रिक्तिकाओं में संगृहीत होते हैं। केरोटिनॉइड्स तथा एन्थोसाइनिन वर्णकों का संश्लेषण फाइटोक्रोम द्वारा नियंत्रित होता है।

(v) हार्मोन नियंत्रण (Hormonal control)– ऑक्सिन फलों की वृद्धि को प्रेरित करते हैं परन्तु परिपक्वन में संदमक का कार्य करते है। जिब्बेरेलीन तथा साइटोकाइनिन क्लोरोफिल अपघटन को रोकते हैं। तथा केरोटिनॉइड्स के संग्रहण को स्थगित करते हैं अर्थात् परिपक्वन क्रिया को संदमित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि ऑक्सिन इथाइलीन संश्लेषण को रोकता है। इथाइलीन को परिपक्वन हार्मोन के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यह फलों के परिपक्वन को प्रेरित करता है। इथाइलीन फलों के परिपक्वन में सबसे महत्त्वपूर्ण हार्मोन है। अधिकतर फलों में क्लाइमेक्ट्रिक वृद्धि से पूर्व इथाइलीन की सान्द्रता में तेजी से वृद्धि होती है जो परिपवन क्रिया को गति प्रदान करती है। बर्ग एवं बर्ग (Burg and Burg, 1962) के अनुसार फलों में परिपक्वन का प्रारम्भन केवल इथाइलीन संश्लेषण में वृद्धि से ही नहीं अपितु इथाइलीन के प्रति इनके उत्तरदायित्व में वृद्धि के फलस्वरूप भी होता है। इथाइलीन सम्भवतः परिपक्वन सम्बन्धी एन्जाइम्स के संश्लेषण को प्रेरित करती है।


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