Botany वनस्पति विज्ञान

प्रश्न 22 : निम्नलिखित पर पुष्पन की कार्यिकी संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिये-

उत्तर- (i) पुष्पन की कार्यिकी (Physiology of Flowering)– पुष्पी पादपों को लाक्षणिक गुण है कि ये अपने जीवनकाल में पुष्प अवश्य धारण करते हैं। कुछ पादप अपने जीवनकाल में केवल एक बार ही पुष्प धारण करते हैं। इस प्रकार के पौधों को एकल फलनी-पादप कहते हैं। इसके विपरीत अधिकतर पादप एक निश्चित समय पर प्रतिवर्ष पुष्प धारण करते हैं इन्हें बहुफलनी पादप कहते हैं।

पुष्पन की क्रिया पादप के जीवन चक्र में महत्त्वपूर्ण घटना है जो कायिक प्रावस्था के जनन प्रावस्था में संक्रमण को प्रदर्शित करती है। प्रत्येक पादप में पुष्पन की क्रिया निश्चित कायिक वृद्धि के पश्चात्। वृद्धि होती है तथा विभिन्न पादपों में कायिक वृद्धि का काल भिन्न-भिन्न होता है। एक वर्षीय शाकीय पौधों में कुछ महीनों में ही पुष्पन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। जबकि बहुवर्षी फलधारी पादपों में पुष्पन की क्रिया कई वर्षों बाद प्रारम्भ होती है। इस प्रकार पुष्पन से पूर्व एक निश्चित कायिक वृद्धि का होना आवश्यक है। पुष्पी पादपों में पुष्पन की क्रिया एक आवश्यक परिवर्तन है जो निश्चित समय पर होता है, जो न तो उससे पहले होता है और न ही बाद में। पौधों में पुष्पन की कार्यिकी क्रियाविधि दो प्रमुख कारकों द्वारा नियंत्रित होती है।

(i) प्रकाश की अवधि अर्थात दीप्तिकालिता (light period or photo periodism)

(ii) तापमान अथवा बसन्तीकरण (temperature of vernalization)।

(i) दीप्तिकालिता के आधार पर पादपों का वर्गीकरण-पादपों का दीप्तिकाल के प्रति अनुक्रिया के आधार पर गारनर एवं एलार्ड ने पादपों को तीन समूहों में बाँटा-

(1) अल्प प्रदीप्तिकाली अथवा लघु दिवसीय पादप (Short day plants, SDP)— ऐसे पादप जिन्हें पुष्पीकरण के लिए 12 घण्टे से कम के दीप्तिकाल (photoperiod) की आवश्यकता होती है, उन्हें लघु दिवस पादप (SDP) कहते हैं। उदाहरण-क्राइसेन्थिमम (chrysanthemum), कॉसमॉस बाइपिन्नेटस (Cosmos bipinnatus), जैन्थियम पेन्सिलवेनिकम (Xanthim pensylvanicum), तम्बाकू (tobacco), सोयाबीन (soyabean) आदि SDP पादप हैं।



चित्रः विभिन्न पादपों के वर्गों के लिए दीप्तिकाल (6-24 घण्टे) की आवश्यकता

(2) दीर्घ प्रदीप्तिकाली पादप अथवा दीर्घ दिवसीय पादप (Long day plants, LDP)— वे पादप जिनेह पुष्पीकरण के लिए एक निश्चित अवधि से अधिक के दीप्तिकाल की आवश्यकता होती है, दीर्घ दिवसीय पादप (LDP) कहलाते हैं। ग्रीष्म ऋतु के लम्बे दिन इन पादपों के लिए परिपूर्ण दीप्तिकाल प्रदान करते हैं। इन पादपों को छोटे अन्धकार काल की आवश्यकता होती है। छोटे दिन से बंधित लम्बे अंधकार काल का पुष्पीकरण पर रुकावंटी प्रभाव पड़ता है, परन्तु लम्बे अन्धकार काल के क्षणिक दीप्तन से इन पादपों में पुष्पीकरण शुरू हो जाता है।

दीर्घ दिवसीय पादपों में पुष्पीकरण दिन की लम्बाई से निर्धारित न होकर छोटे अन्धकार काल से निर्धारित होता है। उदाहरण—डाइएन्थस सुपरबस (Dianthus superbus), मूली, पालक, जई (oat), हेनबेन (Henbane) पत्तागोभी, पिटुनिया (Petunia) लौंग आदि।

(3) दीर्घ उदासीन पादप (Day-neutral plants, DNP)- इन पादपों को किसी विशेष दीप्तिकाल की आवश्यकता नहीं होती है अर्थात् ये पादप अन्धकार-प्रकाश चक्र से अप्रभावी रहते हैं। ऐसे पादप को दीप्ति उदासीन पादप (photoneutral or indeterminate) भी कहते हैं। उदाहरण ककड़ी, टमाटर, बालसम (Balsam), मक्का (maize), कपास (cotton), फलियाँ (beans) आदि।

(ii) बसन्तीकरण (Vernalization) -जल में भीगे हुए बीजों अथवा नवोभिद् पादपों को निम्न ताप उपचार दिए जाने पर पुष्पन के समय को कम करने की विधि को बसन्तीकरण कहते हैं।

पादपों की सामान्य वृद्धि पर तापमान का प्रभाव पड़ता है। अधिकतम, न्यूनतम व अनुकूलतम तापमान पादप की विभिन्न जातियों के लिए पादप की आयु व अन्य वातावरणीय अवस्थाओं में अलग - अलग होते हैं। पौधों में शीत–उपचारित पुष्पन को बसन्तीकरण कहते हैं। इस प्रक्रिया के सम्बन्ध में थॉमसन (Thomson, 1936) ने बताया कि बसन्तीकरण की क्रिया वह है जिसमें बीजों को धोने से पूर्व विशिष्ट तापमान पर रखा जाता है। तथा उनमें पुष्पेन (flowering) की क्रिया का अध्ययन करते हैं।

ऐनन (Anon) के अनुसार शरद् ऋतु (winter) में बोयी जाने वाली गेहूं की किस्मों को बोने से पहले यदि कम तापमान पर उपचारित कर लिया जाता है तो उनमें बसन्तीकरण हो जाता है तथा गेहूँ (wheat) के पौधों में बसन्त ऋतु (spring) के फूल उत्पन्न हो जाते हैं।

ग्रिगोरी (Gregory) ने अपने प्रयोगों के आधार पर पता लगाया कि बसन्तीकरण की क्रियाविधि में हॉर्मोन्स का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने बताया कि कम तापमान पर बीजों को उपचारित करने से एक हॉर्मोन का निर्माण होता है। अतः इसके द्वारा बसन्तीकरण के समय शीघ्र पुष्पन क्रिया होती है।

बसन्तीकरण की क्रिया द्वारा शरद् ऋतु में उगने वाले पौधों को बसन्त ऋतु में भी उगाया जा सकता है तथा पुष्पन की क्रिया देखी जा सकती है तथा इनमें फल एवं बीज भी विकसित होंगे। बसन्तीकरण (vernalization) का प्रमुख उद्देश्य लैंगिक प्रजनन (sexual reproduction) को प्रभावी एवं शीघ्र करना होता है जिससे पुष्पन की क्रिया शीघ्र हो सके। रूस के वैज्ञानिक लाइसेन्को (Lysenko) ने सन् 1934 में सर्वप्रथम बसन्तीकरण का मत प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि पौधों में वृद्धि विभिन्न श्रृंखलाओं (Series) में होती है जिसमें विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। लैगिक जनन (sexual reproduction) के पूर्ण होने से पूर्व वाली अवस्था बसन्तीकरण है। इस अवस्था को प्रभावशाली बनाने के लिए 0°C से 20°C तक उपचारित करके प्राप्त किया जाता है।

शीत उपचार का प्रभाव 'तापक्रम के परास' तथा इसकी अवधि पर निर्भर करता है। बसन्तीकरण के लिए इष्टतम शीतन परास 3°C से 10°C होता है। विभिन्न पादपों की जातियों में विभिन्न आयु पर बसन्तीकरण किया जाता हैं। प्रसुप्त बीज प्रायः बसंतीकरण के योग्य नहीं होते हैं। बसंतीकरण शीघ्र परिवर्धन को प्रेरित करता है। अतः कायिक वृद्धिकाल शीघ्र ही जनन वृद्धिकाल में परिवर्तित हो जाता है और इस प्रकार फलने-फूलने व अंकुरण अवस्था के मध्य की कालवधि घट जाती है। बसंतीकरण की क्रिया के द्वारा सर्दी की फसल के अनाजों का बसंत की फसल बनाया जा सकता है।

बसंतीकरण की तकनीक (Technique of Vernalization)- बसंतीकरण के लिए बीजों को पहले जल में भीगोकर अंकुरित होने दिया जाता हैं। इसके बाद अंकुरित बीजों को 0°C से 5°C पर शीत उपचारित किया जाता है। शीत उपचारित अंकुरित बीजों को कुछ समय के लिए शुष्क होने दिया जाता है। इसके बाद इन बीजों को बो देना चाहिए। अगर बसंतीकृत बीजों का तत्काल ऊष्मा उपचारित कर दिया जाये तो ये तो ये अबसंतीकृत हो जाते हैं।

बसंतीकरण की क्रियाविधि (Mechanism of Vernalization)- पर्विस (Purvis) ने सबसे पहले यह सुझाव दिया कि शीतन उपचार से पुष्पन के लिए आवश्यक हॉर्मोन के पूर्ववर्ती पदार्थ (precursor) का संश्लेषण होता है। यह पूर्ववर्ती पदार्थ प्ररोह शीर्ष पर स्थानान्तरित होकर एक मध्यवर्ती पदार्थ में स्थानान्तरित हो जाता है। प्ररोह शीर्ष में मध्यवर्ती पदार्थ अनुकूल प्रदीप्तिकाल प्राप्त करने पर पुष्पन को प्रेरित करता है।

मेल्चर (Melcher) ने अपने प्रयोगों में पाया कि इस पदार्थ का संचलन होता है। उन्होंने शीत उपचारित हेनबेन (Hyoscyums) पादप को अनुपचारित पादप से कलमबद्ध (grafting) करने पर पाया। कि शीत उपचार प्रभाव अनुपचारित पादप में संचरित हो जाता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि शीत उपचार से पदार्थ प्रकृति के यौगिक का निर्माण होता है। मेल्चर ने इस पदार्थ का नाम वर्नेलिन (Vernalin) दिया।

वर्नेलिन (Vernalin) अथवा इस प्रकार के किसी पदार्थ का निष्कर्षण अभी तक नहीं किया गया है; परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह उद्दीपन पुष्प प्रेरित उद्दीपन-फ्लोरिजन के सहयोग से कार्य करता है। वर्नेलिन तथा फ्लोरिजन के पुष्पन से सम्बन्ध को निम्नांकित प्रकार से प्रदर्शित किया जा सकता है



चित्र- वर्नेलिन तथा फ्लोरिन का पुष्पन में सम्भावित योगदान

बसंतीकरण का महत्त्व (Significance of Vernalization)-

(1) इस प्रक्रिया के द्वारा पौधों में प्रकाश संश्लेषण अधिक तीव्र गति से होता है।

(2) इससे कायिक वृद्धि (vegetative growth) कम होती है, लेकिन बनने वाले बीज चमकीले, अधिक भारी तथा स्वस्थ होते हैं।

(3) इसके प्रभाव से गेहूँ एवं जौ में बसन्तीकरण (vernalization) के द्वारा प्रतिरोध (drought resistance) पैदा हो जाता है।

(4) इस प्रकार के पौधों में पत्तियों से क्लोरोप्लास्ट की मात्रा ज्यादा पायी जाती है।

(5) इसके प्रभाव से एकवर्षीय पौधे समय से पहले ही उसी मौसम में पुष्पन (flowering) करने लगते हैं।


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