Botany वनस्पति विज्ञान

प्रश्न 21 : ऑक्सिन, जिब्बरेलिन तथा इथाइलीन हार्मोन की संरचना, क्रियात्मक योगदान तथा उपयोग को समझाइये।

उत्तर–आँक्सिन (Auxins)- कोग्ल तथा हैगन-स्मिट (Kogl and Haagen-Smit, 1931) ने मनुष्य के मूत्र से क्रिस्टलीय पदार्थ पृथक किया तथा जब इस पदार्थ को शिरोच्छेदित प्रांकुरचोल पर अकेन्द्रित रूप से डाला गया तो पाया कि यह वक्रण के लिए उत्तरदायी है। इस पदार्थ का नाम ऑक्सिन-A (auxine-A, auxanotriolic acid) रखा गया। इसका अणुसूत्र C18H32O6 है। तथा यह एक क्रिस्टलीय पदार्थ होता है। रासायनिक रूप में यह एक मोनोसाइक्लिक ट्राइहाइड्रोक्सी कार्बोक्सिलिक अम्ल होता है।

कोग्ल, इरेक्सलेबन तथा हैगन-स्मिट (Kogal, Exexlaben and Haagen-Smit, 1934) ने मक्का भ्रूण तेल से इसी प्रकार का सक्रिय पदार्थ प्राप्त किया तथा इसे ऑक्सिन B नाम दिया गया। इसका अणुसूत्र C10H30O4 है तथा रासायनिक रूप में यह मोनोसाइक्लिक हाइड्रोक्सिकिटो कार्बोक्सिलिक अम्ल होता है। उन्होंने मनुष्य के मूत्र से तीसरे प्रकार के ऑक्सिन का भी पृथक्करण किया जिसे हेटरोऑक्सिन कहा गया। इसका अणुसूत्र C10H9O2N है तथा इसे इण्डोल-3 एसिटिक अम्ल (IAA, Indole-3-acetic acid) कहते हैं।

जिब्बरेलिन (Gibberelline)– जापानी किसानों ने उनके धान के खेतों में पाया कि कुछ धान के पादप अन्य पादपों से लम्बे एवं बहुत पतले हो गये कि बीज बनने से पूर्व ही गिर जाते थे। इस स्थिति को बैकने ने निर्बुद्धि नवोद्भिद रोग कहा। कुरोसावा (Kurosawa, 1926) ने इस रोग का कारक एक कवक जिबरेला फ्यूजिकोराई (Gibberella fojikuroi) को बताया। यह फ्यूजेरियम मोनिलीफामी की लैंगिक अवस्था है। उन्होंने पाया कि इस कवक के संवर्ध निस्सार (culture extract) से भी पौधों पर रोग के लक्षण परिलक्षित हो जाते हैं। याबूटा, हावाशी एवं काहंबे (Yabuta, Hayashi and Kahnbe, 1930) ने सर्वप्रथम इस वृद्धिकारी पदार्थ को कवक से पृथक कर इसे जिबरेलिन नाम दिया।

कुल मिलाकर जिबरैला कवक से GA, GA2, GA3, GA4, GA7 व GA9 विलगित किये गये थे जिनमें से सर्वप्रथम GA3 विलगित किया गया। आवृतबीजी पादपों में सबसे पहले मैकमिलन एवं सटर ने फेसियोलस कोसिनस Phaseeolus coscineus) के अपरिपक्व बीजों से जिबरेलिन विलगित किया।



चित्रः जिब्रेलिक (GA3) अम्ल की संरचना

इथाइलीन (Ethylene)— इथाइलीन एक असंतृप्त हाइड्रोकार्बन गैस होती है। इसे CH2=CH2 से निरुपित किया जाता है। यह वायु से हल्की होती है। इसका सरलतापूर्वक ऑक्सीकरण किया जा सकता है।

(A) ऑक्सिन (Auxin) - ऑक्सिन की पादप वृद्धि को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करने की प्रवृत्ति के कारण अनेक प्राकृतिक एवं संश्लेषित ऑक्सिनों का विभिन्न प्रकार से उद्यान कृषि में उपयोग किया जाता है।

ऑक्सिन के अनुप्रयोग (Application of Auxins) - ऑक्सिन के निम्नलिखित अनुप्रयोग मुख्य हैं।

(1) पर्वो का छोटा होना (Shortening of internodes) -

सेव (apple) और नाशपाती (pear) में दो प्रकार की शाखाएँ होती हैं जिनमें से केवल बौनी (dwarf) शखाओं पर फल लगते हैं। तने के शीर्षस्थ क्षेत्रों पर α- नैफ्थेलिन एसिटिक अम्ल (α-NAA) का छिड़काव (spray) करने से बनने वाली नयी शाखाएँ बौनी रह जाती हैं और उन पर भी फल लगने लगते हैं।

(2) कोशिका विभाजन (Cell devision) - एधा (cambium) के विभाजन के समय और क्षति (injury) के समय कैलस (callus) का बनना, इण्डोल एसिटिक अम्ल (I.A.A.) के कारण होता है। कलम बाँधते (grafting) समय एधा का विभाजन और केलस बनने की क्रिया में (I.A.A) इस प्रकार काम में लाया जा सकता हैं। ऊत्तक संवर्धन (tissue culture) में पोषक विलयन (nutrient solution) में, कोशिका विभाजन सुलभता से कराने के लिए I.A.A. मिलाया जाता हैं।

(3) पतन की रोकथाम (Prevention of lodging) – जई (oat) और अलसी (flex) आदि पौधों में नीचे के पर्वो की कोशिकाओं में अत्यधिक दीर्धीकरण (elongation) और मृदुलता (softness) पायी जाती है। इस कारणवश पौधे झुक जाते हैं। इस प्रक्रिया को पतन (lodging) कहा जाता हैं। इन पौधों के निचले भाग को α- नैथिल एसिटामाइड (α– naphythyl acetamide) देने से यह भाग दृढ़, काष्ठीय और सीधे हो जाते हैं।

(4) शीर्ष प्रमुखता (Apical dominance) - अनेक पौधों में शीर्षस्थ कली की उपस्थिति में पाश्र्वीय कलियों की वृद्धि रूकी (inhibited) रहती है। इस स्थिति को शीर्ष प्रमुखता (apical dominance) कहते हैं यह पौधों के शीर्षस्थ कली में ऑक्सिन की अधिक मात्रा के कारण होता हैं। यदि शीर्षस्थ कली को हटाकर, कटे क्षेत्र पर ऑक्सिन लगाया जाता है, तब भी पाश्र्वीय कलियाँ वृद्धि कर पाती हैं।

शीर्षस्थ कली को काटने से पार्वीय कलियाँ अधिक तेजी से बढ़ने लगती हैं। घरों के बगीचों में लगी बाढ़ (hedge) की काट – छाट (pruning) से शीर्षस्थ कलियों का अलग किया जाता है।

इसी प्रकार तम्बाकू (tobacco) में शीर्षस्थ कलियाँ पृथक् की जाती हैं। इस प्रक्रिया का टॉपिंग (topping) कहते हैं और इस कारण पाश्र्वीय कायिक (vegetative) कलियों से बड़े आकार की पत्तियाँ बनती हैं।

(5) जड़ों का समारम्भन (Root intiation) - प्राकृतिक स्थितियों में जड़ों का समारम्भन तब होता हैं, जब पौधे पर विकास होती हुई कलियाँ (buds) अथवा युवा पत्तियाँ लगी हुई हों। इनकी उपस्थिति के कारण जड़ के लिए आवश्यक ऑक्सिन प्राप्त होता है। पौधे की कलम (cuting) से जड़, केवल तने के शीर्ष से दूर की ओर के क्षेत्र में बनती हैं। यदि कलम के इस भाग पर अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में ऑक्सिन छिड़का जाता है, तब अपरथानिक जड़ों (adventitious roots) का निर्माण होता हैं। उद्यान कृषि (horticulture) की दृष्टि से अथवा संवर्धन क्यारियों (nursery) की दृष्टि से, कलमों में जड़ों का समारभन अत्यन्त महत्त्व रखता है। ऑक्सिन लगाकर बोगेनविलिया (bougainvillea) जैसे पौधों मे जड़ों का समारम्भन अत्यन्त उपयोगी है।

(6) पुष्पन का समारम्भन (Initiation of flowering) - अन्नास (pineapple) में पुष्पन (flowering) लगभग वर्षभर होता रहता है और फलों का निर्माण सम्पूर्ण वर्ष अनिश्चित (erratic) रूप से होता हैं। इस कारण पूरे वर्ष देखभाल, सावधानियाँ इत्यादि आवश्यक हो जाती हैं। 2, 4 -D, ऐसिटिलिन (acetylene) और NAA की कम सान्द्रता के छिड़काव से पुष्पन एक समय होता हैं और कठिनाईयाँ दूर हो जाती हैं।

(7) प्रसुप्ति (Dormancy) - आलू के कन्द भी शीर्ष प्रमुखता दिखाते हैं। जब आलू का सम्पूर्ण कन्द उगाया जाता है, तब केवल शीर्षस्थ कलियों के गुच्छे से प्ररोह (shoots) निकलते हैं तथा पाश्र्वीय कलियाँ निष्क्रिय रहती हैं।

इसके विपरीत आलू को इण्डोल ब्यूटाइरिक अम्ल (indole butyric acid), α- नैफ्थेलिन एसिटिक अम्ल (α-NAA), मैलिक हाइड्रोजोइड (mallic hydrazoide) देने से पाश्र्वीय कलयों का अंकुरण (sprouting) रुक जाता है और इस प्रकार आलुओं का संग्रह (storage) लगभग 3 वर्ष तक किया जा सकता है।

(8) अनिषेकफलन (parthenocarpy) - बीजों का बनना और फलों का विकास, परागकण और निषेचन के पश्चात् होता हैं। इस क्रिया में अंडाशयों की भित्ति (ovarywall) का फल भित्ति (fruit wall) में परिवर्तन, पराग नलिका (plllen tube) से प्राप्त उद्दीपन (stimulus) के कारण होता हैं। इस कारण ऑक्सिन बनता है और फल भित्ति का विकास हो जाता हैं। परागकण और निषेचन के अभाव में अंडाशय को ऑक्सिन दिया जाता है। इस विधि से बीज तो नहीं बनते, परन्तु अंडाशय भित्ति का फल भित्ति में परिवर्तन मात्र हो जाता हैं। उन फलों में जिनकी फल भित्ति खाने योग्य होती है। IAA, NAA इत्यादि ऑक्सिन देकर अनिषेकफलन किया जाता हैं और बीजरहित फल उत्पन्न किये जाते हैं।



चित्र - अनिषेकफलन : परागकण का उद्दीपन, ऑक्सिन के द्वारा पुनःस्थापित करना

(9) कृषि में उपयोग (Use in agriculture) – ऑक्सिन का कृषि, उद्यान आदि में अत्यधिक उपयोग होता है। अनेक ऑक्सिन, कलमों में नई जड़े निकालने, विलगन (abscission) रोकने, अनिषेकफलन (Pethenocarpic fruits) पैदा करने, प्रसुप्तावस्था बनाये रखने, फसल उगाने, फलों को अधिक पकाने (maturation), बंध्यीकरण (sterility) रोकने, बीज संग्रह करने आदि अनेक तरह से प्रयोग में लाये जाते हैं।

(10) प्रोटीन संश्लेषण का कार्य- ऑक्सिन प्रोटिन के निर्माण में मदद करती है जो भित्ति की लचकता तथा फैलाव की क्षमता को बढ़ाती है।

(11) विलगन परत का नियन्त्रण (Prevention of abscission layer) – विलगन परत बनने से पत्तियाँ, फूल और फल, कालपूर्व (premature) गिर जाते हैं। यह विलगन परत ऑक्सिन प्रवणता (auxin gradient) के कारण बनती है। पत्तियों के नीचे की ओर पर्णवृन्त (petiole) में पहुँचने वाले ऑक्सिन का पत्तियों में निर्माण कम होने के कारण विलगन परत बनती है। पत्तियों से उत्पन्न ऑक्सिन की कमी को 2, 4, D IAA, NAA इत्यादि को देकर दूर किया जाता है और विलगन परत को बनने से रोकना सम्भव होता है। इस प्रकार सेव, नाशपाती, नींबू इत्यादि फल वृक्षों से फलों के गिरने को रोका गया है।

(B) जिबरेलिन (Gibberellins) - जिबरेलिन दूसरा महत्त्वपूर्ण पादप हार्मोन हैं जो पादपों व नवोभिदों में दीर्धीकरण, दीर्घ दिवसीय पादपों में पुष्पन, खद्यान्न में बीजांकुरण व अन्य अनेक प्रक्रियाओं को प्रेरित व प्रभावित करते हैं।

(जिबरेलिन के अनुप्रयोग (Application of Gibberellins) - जिबरेलिन के मुख्य अनुप्रयोग निम्न हैं-

(1) पर्व दीर्घन (Internodalgrowth) - जिब्बरेलिन पौधों में पर्व दीर्घन अथवा स्तम्भ की लम्बाई में वृद्धि को प्रेरित करता है। यह प्रभाव उन पादपों में अधिक स्पष्ट होता हैं जो आनुवंशिक रूप से वामन (drarf) होते हैं। ऐसे द्विवर्षी पादप जो पहले वर्ष में रोजेट स्वभाव (rosette habit) प्रदर्शित करते हैं, में भी जिब्बरेलिन द्वारा विवर्धन होता है। जनन प्रावस्था से पूर्व इनमें पर्व का अत्यधिक दीर्घन होता है, परन्तु पत्तियों का निर्माण नहीं होता है। इस दीर्घित पर्णहित पर्व का बोल्ट (bolt) कहते हैं तथा इस क्रिया को बोल्टकरणे (bolting) कहते हैं। बोल्टकरण के बाद पुष्पन की क्रिया होती है। इन पादपों में बोल्टकरण तथा पुष्पन की क्रिया तभी होती है, जब आवश्यक कारक उपस्थित हों, जैसे- दीर्घ प्रदीप्तकाली (long day plants)।

बोल्टकरण के समय जिब्बरेलिन कोशिका विभाजन तथा कोशिका विविर्धन उत्प्रेरित करते हैं। इसके विपरीत अल्पप्रदीप्तकाली पादपों में ये पुष्पन क्रिया को संदमित करते हैं।

(2) बीजांकुरण (Seed germination) - धान्य फसलों जैसे गेहूँ, जौ आदि के बीजों के अंकुरण में जिब्बरेलिन मुख्य भूमिका निभाते हैं। इन बीजों के भ्रूणपोष में स्टार्च, प्रोटीन आदि का संग्रहण होता है। तथा यह एल्यरोन परत द्वारा परिबद्ध रहता है। एल्यूरोन परत विभिन्न जल अपघटयकारी (hydrolytic) एन्जाइम का स्रोत होता है जो भ्रूणपोष में संचित स्टार्च व अन्य पदार्थों का बीजांकुरण के समय अपघटन करता है।

जिब्बरेलिन के उद्दीपन द्वारा एल्यूरोन परत से α- एमाइलेज, β- एमाइलेज, β-1-3 ग्लूकोनेज, प्रोटीएज तथा राइबोन्यूक्लिएज आदि का संश्लेषण होता है।

(3) पुष्पन (Flowering) - पुष्पन क्रिया में जिब्बरेलिन का महत्त्वपूर्ण कार्य है। यह पौधों में पुष्पन के लिए प्रेरक शीतकाल (vernalization) तथा आपेक्षित दीप्तिकाल (photoperiod) का प्रतिस्थापन करने में सक्षम होता है लैग (1980) ने प्रदर्शित किया कि हायोसाइमस नाइगर (Hyoscymus niger) में जिब्बरेलिन उपचार द्वारा दीर्घदीप्तिकाल को प्रतिस्थापित किया जा सकता है। जिब्बरेलिन के माध्यम द्वारा पुष्पी हॉर्मोन फ्लोजिन (florigen) का संश्लेषण होता हैं। इसके विपरीत कुछ काष्ठीय आवृत बीजियों जैसे - सेब, बोगेनविलिया आदि में जिब्बरेलिन पुष्पन क्रिया का संदमन करते हैं।

कुछ पादपों में जिब्बरेलिन लिंग अभिव्यक्ति (sex expression) को भी प्रभावित करते हैं। अधिकांश उदाहरणों में जिब्बरेलिन के अनुप्रयोग से नर पुष्पों की संख्या में वृद्धि होती है। उदाहरण - कुकुमिस सैटाइवा (Cucumis sativa), केनाबिस सैटाइवा (Canabis sativa) तथा ब्रायोफिलम (Bryophyllum) आदि।

(4) प्रसुप्तता भंग करना (Breaking of dormancy) - शीतोष्ण क्षेत्र के सदाबहार (evergreen) पादपों तथा पर्णपाती वृक्षों की कलिकाएँ ग्रीष्म ऋतु में प्रसुप्त हो जाती हैं। प्रसुप्त अवस्था में कलिकाएँ ठण्ड अथवा अतिजलाभाव के प्रभाव से बच जाती हैं। इसी प्रकार अनेक बीजों में भी प्रसुप्तावस्था पाई जाती है। प्रकृति में यह प्रसुप्तता दीर्घ ताप अथवा प्रकाश प्रभाव दूर हो जाती है। जिब्बरेलिन से उपचारित कर इस प्रकार की प्रसुप्तता को भंग किया जा सकता है। इस प्रकार जिब्बरेलिन पौधों पर शीत उपचार अथवा प्रकाश उपचार के रूप में प्रभाव डालता है।

(5) जीर्णता को रोकना (Prevention of senescence)- फ्लेचर तथा ऑस्बोर्न (Fletcher and Osborne, 1965) के अनुसार जिब्बरेलिन के अनुप्रयोग से पत्तियों की जीर्णता को रोका जा सकता है। उन्होंने अपने प्रयोगों में पाया कि टेरेक्सनम (Taraxanum) पर जिब्बरेलिन के प्रयोग से जीर्णता को रोका जा सकता है। पत्तियों में जीर्णता के समय सामान्यतः आंतरिक जिब्बरेलिन की मात्रा काफी कम हो जाती हैं। इसलिए इनके बाह्य उपयोग से ऊतकों में साद्रता बढ़ने पर जीर्णता स्थगित हो जाती है। पत्तियों के अंलावा फलों में भी जिब्बरेलिन के अनुप्रयोग से जीर्णता को स्थगित किया जा सकता है। संग्रहित फलों पर जिब्बरेलिन के छिड़काव से उनकी फलभित्ति के गलन को रोका जा सकता है।

(6) अनिषेचकफलन (Parthenocarpy) - ऑक्सिन की तुलना में जिब्बरेलिन अनिषेक फलन को प्रेरित करने अधिक प्रभावशाली होते हैं। जिब्बरेलिन रोजेसी कुल के पादपों में जहाँ पोम फल (सेब, नाशपाती) का निर्माण होता है, अनिषेकफलन को प्रेरित करने में सक्षम होते हैं। इन पादपों में ऑक्सिन इतने प्रभावी नहीं पाये जाते हैं। जिब्बरेलिन फलों की वृद्धि को विभिन्न स्तर पर प्रभावित करते है। इनके अनुप्रयोगों से बैंगन, टमाटर, अमरूद, अंगूर आदि अनेक पादपों में अनिषेक फल प्राप्त किये गये हैं।

(C) साइटोकाइनिन (Cytokinins) - यह भी एक महत्त्वपूर्ण पादप हॉर्मोन है जो कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है।

साइटोकाइनिन के अनुप्रयोग (Application of Cytokinins)- साइटोकाइनिन का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव कोशिका विभाजन को प्रेरित करना है। इसकी अत्यन्त अल्प मात्रा ही अत्यधिक प्रभावशाली व कार्यकारी होती है। लेकिन इसके अधिकांशतः कार्यकारी प्रभाव ऑक्सिन की उपस्थिति में होते हैं।

(1) कोशिका विभाजन - ऑक्सिन के साथ मिलकर साइटोकाइनिन परिपक्व कोशिकाओं में भी कोशिका विभाजन को प्रेरित कर देते हैं। ये अकेले कोशिका विभाजन के सक्षम नहीं होते हैं। यह प्रभाव मिलर व साथियों ने तथा दास ने देखा था।

(2) प्रतिरोधकता - साइटोकाइनिन से उच्च तापमान (49.5°C), निम्न तापमान (-20°C) एवं रोग के प्रति प्रतिरोधकता बढ़ जाती है।

(3) शीर्ष प्रभाविता का प्रतिकार - साइटोकाइनिन के कारण शीर्षस्थ कलिका की उपस्थिति में भी पाश्र्व कलिकाएँ वृद्धि कर जाती हैं।

(4) कोशिका विवर्धन - मिलर तथा कुरैशी एवं ओकुमूरा एवं अन्य के अनुसार यह ऑक्सिन व जिबरेलिन की भाँति कोशिका विवर्धन को भी प्रेरित करता है। पत्तियों के प्रसार को बाहर से साइटोकाइनिन देकर बढ़ाया जा सकता है। ऑक्सिन के साथ यह क्षमता दुगुनी हो जाती है।

(5) जीर्णता में देरी - रिचमण्ड एवं लैंग ने साइटोकाइनिन के प्रभाव से जीर्णता में देरी का प्रभाव देखा। इस प्रभाव को रिचमण्ड एवं लैंग प्रभाव कहते हैं। उन्होंने जैन्थीयम पादप से विलगित पत्ती में देखा कि साइटोकाइनिन की उपस्थिति में क्लोरोफिल, न्यूक्लिक अम्ल व प्रोटीन के नष्ट होने की प्रक्रिया काफी दिनों बाद होती है।

सामान्यतः जीर्णता से पहले पत्तियों में उपस्थिति इन पदार्थों का विघटन होने लगता है। साइटोकाइनिन RNA संश्लेषण को प्रेरित करते हैं एवं RNA एज की सक्रियता को कम करते हैं। अतः प्रोटीन, क्लोरोफिल इत्यादि का संश्लेषण होते रहने से जीर्णता में विलम्ब होता है।

(6) प्रकाश संवेदी बीजों का अंकुरण- साइटोकाइनिन के उपचार से लेट्यूस एवं तम्बाकू के बीज अन्धकार में भी अंकुरित हो जाते हैं। सुदूर लाल प्रकाश के संदमक प्रभाव को साइटोकाइनिन के उपचार से उदासीन किया जा सकता हैं। स्ट्राइगा एशियाटिका के बीज परपोषी के सम्पर्क में आने से ही अंकुरित होते हैं, परन्तु साइटोकाइनिन के उपचार से यह परपोषी की अनुपस्थिति में भी अंकुरित हो जाते हैं। तम्बाकू, जैन्थीयम एवं लैम्ना आदि अनेक पादपों में साइटोकाइनिन लाल प्रकाश के समान प्रभाव दर्शाते हैं एवं अंकुरण। प्रेरित करते हैं।

(7) मूल पर प्रभाव - प्राथमिक मूल के दीर्घीकरण का संदमन, मूल प्रारम्भन, मूल व्यास में वृद्धि, वाहिनिकाओं के लिगनीकरण में वृद्धि इत्यादि भी साइटोकाइनिन के प्रभाव हैं।

(8) पोषक पदार्थों का अभिगमन - साइटोकाइनिन पत्तियों में पोषक पदार्थों की आवागमन का नियंत्रित करता हैं। साइटोकाइनिन की उपस्थिति में पोषक तत्त्व अन्य अंगों की अपेक्षा उस क्षेत्र की ओर अधिक अभिगमन करते हैं तथा वहाँ एकत्रित होते हैं। यह प्रक्रिया साइटोकाइनिन प्रेरित पोषक अभिगमन कहलाती है। परिपक्व पत्तियों में विशिष्ट स्थान पर साइटोकाइनिन की सान्द्रता बढ़ने से वे पुनः हरे हो जाते हैं।

(9) कृषि में उपयोगिता - यह ऊत्तक संवर्धन द्वारा अनेक बहुमूल्य पादपों जैसे आर्किड व बहुमूल्य पादपों के प्रवर्धान विशेषकर कैलस से प्ररोह व मूल विभेदन के लिए उपयोगी है। यह पत्तेदार सब्जियों को ताजा रखने के लिए भी उपयोग में लिया जाता है।

(D) इथाईलीन (Ethylene) -यह प्रदूषक गैस कहलाती है। परन्तु पादपों में अत्यन्त अल्प मात्रा में सशक्त परिपक्वन हॉर्मोन के रूप में कार्य करती है।

इथाइलीन के अनुप्रयोग (Application of Ethylene) -

(1) पुष्पन एवं लिंग अभिव्यक्ति (Flowering and Sex Expression) - इथाइलीन की उपस्थिति में लघु दिवसीय पादप (SD plants) दीर्घ दिवसीय परिस्थितियों में पुष्पित हो जाते हैं। अनेक पादपों में इथाइलीन पुष्पन को संदमित करती है। अनेक पादपों जैसे कुकुकमस सैटाइवा (Cucumis sativa) में इथाइलीन अन्य हॉर्मोनों के साथ पुष्पों की लिंग अभिव्यक्ति में महत्त्वपूर्ण होती है।

(2) फल पक्वन (Frit Ripening) - फल पक्वन सामान्यतः फल को खाने योग्य बनाने के लिए होने वाले परिवर्तनों को कहते हैं। इथाइलीन को बाहर से देने पर खाद्य फलों में पक्वन की क्रिया तीव्र हो जाती है। फल पक्वन के साथ ही इथाइलीन का स्तर भी तेजी से बढ़ता हैं। अक्लाइमैक्ट्रिक फलों में इथाइलीन देने पर पक्वन में तेजी नहीं आती।

(3) मूल वृद्धि (Root Growth) - इथाइलीन मूल में दीर्धीकरण को संदमित करता है व मोटाई अथवा पार्श्व वृद्धि को उद्दीपित करता है। इथाइलीन तना व पत्तियों से अपस्थानिक मूल विकास (development of adventitiouns roots) को प्रेरित करता है।

(4) जीर्णता (Senescence) - इथाइलीन पादप अंगों में जीर्णता (Senescence) में वृद्धि (enhance) करती है। अनेक पादपों में बाहर से इथाइलीन की आपूर्ति करने पर ज़ीर्णता में तीव्रता देखी गई है। पत्तियों के क्लोरोफिल की हानि व पीलेपन तथा फूलों के बदरंग होने के साथ - साथ इथाइलीन के स्तर में भी बढ़ोतरी होती है। इथाइलीन के संश्लेषण व सक्रियता के संदमकों की उपस्थिति में पर्ण जीर्णता में कमी आती हैं।

(5) विलगन (Abscission) -इथइलीन पादपों में पत्तियों, पुष्पों व फलों के विगलन को उद्दीपित करता है व विगलन क्षेत्र में कोशिका भित्ति के अपघटनकारी एन्जाइमों के प्रेरण का उद्वीपित करता है।

(6) संरचना विकास प्रभाव (Morphogenetic Effects) - इथाइलीन के प्रभाव से नवोभिद् (seedlings) में कोशिका दीर्धीकरण (elongation) कम हो जाता है तथा कोशिकाएँ चौड़ाई में फैलने लगती है। इससे नवोभिद् में हुक के नीचे का भाग फूल जाता है। अरेबिडोप्सिस (Arabidopsis) में hypocotyl फूल जाता है तथा मूल की लम्बाई नर्फी बढ़ती। ये पत्तियों के प्रसार को रोकता है तथा वातरंध्रों में अतिवृद्धि का कारक होता है। इससे इस क्षेत्र की कोशिकाएँ अत्यधिक बड़ी हो जाती है।

(7) सुषुप्ति का प्रतिकार (Breaking Dormancy) - मूंगफली में बीजांकुरण व इथाइलीन के स्तर में सीधा सम्बन्ध देखा गया है। अनाज वर्ग के बीजों में इथाइलीन देने पर सुषुप्तावस्था समाप्त हो जाती है व अंकुरण होता है। आलू व अन्य कन्दों में इथाइलीन से कलिका सुषुप्तावस्था समाप्त होती है, अंकुरण प्रेरित होता है तथा पादपकों का निर्माण होता है।

(8) जलीय पादपों में दीर्धीकरण (Elongation in Aquatic Species) - इथाइलीन सामान्यतः तने में दीर्घाकरण के संदमित करने के विपरीत अनेक निमग्न (submerged) जलीय पादपों, जैसे- रैननकुलस स्क्लीरेटस (Ranunculus scleratus) एवं निम्फॉइडिस (Nymphoides) तथा जलनिमग्न धान (rice) में इथाइलीन के कारण पर्व दीर्धीकरण तेजी से होता है। फलतः पादपों की लम्बाई बढ़ जाती है।

(9) कृषि में उपयोगिता (Use in Agriculture) -

(अ)- यह अनेक फलों के परिपक्वन में सहायक है इसलिए कच्चे तोड़े गये फलों को इथाइलीन के वातावरण में रखकर शीघ्रता से पकाया जा सकता है। पके हुए फलों से विसरित होने वाली इथाइलीन कच्चे फलों को शीघ्रता से पकाने में सहायक होती हैं।

(ब)- इथाइलीन का प्रयोग अनानास व आम के पेड़ों पर किया जाता है। वाणिज्यिक उत्पाद ईथरल (etheral) के छिड़काव से इन पौधों में पुष्पन प्रेरित होता है तथा सभी फल एक साथ पकते हैं जिससे इनको एक ही बार तोड़ लिया (harvest) किया जाता है।

(स)- क्यूक्यूमिस सेटाइवस तथा कुकुरबिटा पिपो में इथाइलीन के अनुप्रयोग से नर पुष्पों का निर्माण कम किया जाता है तथा मादा पुष्पों का निर्माण प्रेरित किया जाता है जिससे उत्पादन बढ़ता है।

(ii) फाइटोक्रोम की कार्यकीय भूमिका (Physiological Role of Phytochrome) - फाइटोक्रोम उच्च पादपों में कार्यिकी प्रक्रियाओं को नियन्त्रित करता है। फाइटोक्रोम की मध्यस्थता से सम्पन्न होने वाली कुछ प्रमुख प्रक्रियाओं का वर्णन निम्न प्रकार से हैं -

(1) बीजांकुरण (Seed-germination) - जीन बीजों के अंकुरण के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है उन्हें प्रकाश प्रसुप्त बीज (photodorment seeds) कहते हैं। इस प्रकार के बीजों में प्रकाश उद्भासन द्वारा (expose to light) बीजांकुरण को प्रेरित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में फाइटोक्रोम का योगदान होता हैं क्योंकि अधिकतर मामलों में लाल प्रकाश अंकुरण में वृद्धि करता है तथा अवरक्त प्रकाश का समंदन करता है।

(2) पुष्पन (Flowering) - फाइटोक्रोम की पुष्पन क्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। दीर्घदीप्तिकालिक अवस्थाओं में Pfr लम्बी अवधि तक बना रहता है तथा LDP में पुष्पन को प्रेरित करता है। जबकि SDP में पुष्पन का समंदन करता है। अल्प दीप्तिकाल अवस्थाओं में Pr लम्बी अवधि तक बना रहता है जो SDP में पुष्पन को प्रेरित करता है। फाइटोक्रोम सम्भवतः पुष्पन उद्दीपन को ट्रिगर (trigger) करने का का कार्य करता है।

(3) नवोभिद् की स्थापना (Establishment of seedlings) - एक बीजपत्रियों में प्रांकुरचोल की वृद्धि, मिजोकोटाइल (mesocotyle) का विस्तार, पत्तियों का विकुण्डलन तथा विस्तार प्रकाश द्वारा प्रेरित होता है अर्थात् फाइटोक्रोम द्वारा नियन्त्रित होता है। Pfr सम्भवतः जिबरेलिन तथा साइटोकाइनिन संश्लेषण को प्रेरित करता है जो इन परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी होते हैं।

द्विबीजपत्रियों के भुम्युपरिक बीजांकुरण में प्ररोह शीर्ष के निकट हुक का निर्माण होता है जो ऑक्सिन–प्रेरित एकदिशीय वृद्धि का परिणाम है। हुक के खुलने से प्ररोह व बीजपत्र मृदा सतह से बाहर आते हैं तथा हुक के खुलने के लिए लाल प्रकाश उत्तरदायी होता है।

(4) क्लोरोप्लास्ट परिवर्धन (Chloroplast development) - क्लोरोप्लास्ट का परिवर्धन तथा प्रकाश संश्लेषी एन्जाइमों का संश्लेषण फाइटोक्रोम के माध्यम से होता है तथा ये दोनों प्रक्रियाएँ लाल प्रकाश द्वारा प्रेरित होती हैं। अंधकार में उगने वाले नवोभिद् पीले पड़ जाते हैं क्योंकि प्रकाश के अभाव में क्लोरोप्लास्ट्स का रूपान्तरण इटियोप्लास्ट्स (itioplosts) में हो जाता है।

(5) कायिक वृद्धि (Vegetative growth) - प्रकाश के प्रभाव से परिपक्व पौधों में कायिक वृद्धि फाइटोक्रोम के माध्यम से प्रभावित होती हैं। द्विबीजपत्रियों में स्तम्भ दीर्घन का संमदन लाल प्रकाश द्वारा फाइटोक्रोम के माध्यम से तथा नीले प्रकाश द्वारा क्रिप्टोक्रोम के माध्यम से होता है। यदि किसी द्विबीजपत्री पादप या कोनीफर को अवरक्त प्रकाश या छाया में उगाया जाता है इनमें तना अत्यधिक दीर्घित हो जाता है तथा शाखन भी कम होता है। आवरक्त प्रकाश या छाया का प्रभाव मुख्यतः Pfr के स्तर में कमी के कारण होता है।

(6) एन्थोसाइनिन संश्लेषण (Synthesis of Anthocyanins)- अधिकत्र पादप अपने कुछ अंगों या विशिष्ट कोशिकाओं में एन्थोसाइनिन वर्णक तथा अन्य फ्लेविनाइड का संश्लेषण करते हैं। यह क्रिया प्रकाश द्वारा प्रेरित होती है तथा सामान्यतः लाल, अवरक्त व नीले प्रकाश में अधिकतम होती है। प्रभावी नीले तरंगदैर्ध्य प्रकाश का अवशोषण क्रिप्टोक्रोम द्वारा जबकि लाल व अवरक्त तरंगदैर्घ्य प्रकाश का अवशोषण फाइटोक्रोम द्वारा होता है। अधिकतर शरद पण में जीर्णता के समय फ्लेविलाइड्स का संश्लेषण व संग्रहण होता है। इसके अतिरिक्त लिग्निन का निर्माण भी प्रकाश द्वारा प्रेरित होता है। यही कारण है कि प्रकाश में उगने वाले नवोभिद् छाया में उगने वाले नवोभिद् की तुलना में कठोर होते हैं।

(7) क्लोरोप्लास्ट की व्यवस्था (Arrangement of chloroplast) - प्रकाश पर्णमध्योतक कोशिकाओं में क्लोरोप्लास्ट की स्थिति को प्रभावित करता है। मन्द प्रकाश में क्लोरोप्लास्ट इन कोशिकाओं की बाह्य व आन्तरिक भित्तियों पर एकपंक्तिक व्यवस्थित हो जाते हैं। क्लोरोप्लास्ट व्यवस्था की इस स्थिति का एपिस्ट्रोफि (epistrophe) कहते हैं। इसके विपरीत अत्यधिक तीव्र प्रकाश में ये कोशिकाओं की पार्श्व भित्तियों के साथ विन्यासित हो जाते हैं तथा यह विन्यास पेराट्रोफि (paratrophe) कहलाता है। अंधकार में यह एक दूसरे से पृथक होकर बिना किसी क्रम में विभिन्न रूपों में विन्यासित हो जाते हैं तथा इस अवस्था को एपोस्ट्रोफि (apostrophe) कहते हैं।

(8) परागकणों कणों का अंकुरण (Pollen germination) - लाल प्रकाश परागनली के विकास को प्रेरित करता है जबकि अवरक्त प्रकाश इस प्रक्रिया पर विपरीत प्रभाव ड़ालता है। मूंगफली के परागकणों में परागनली निर्माण पर लाल तथा अवरक्त प्रकाश का प्रभाव व्युत्क्रमणीय पाया गया है जिससे प्रमाणित होता है कि यह एक फाइटोक्रोम मध्यस्थ प्रक्रिया है।

(9) जैव रासायनिक व उपापचयी प्रभाव (Biochemical and metabolic response) - फाइटोक्रोम के अधिकतर प्रकाश प्रेरित प्रभाव पादप में होने वाले उपापचयी प्रभावों या परिवर्तनों के फलस्वरूप होते हैं। कोशिकीय श्वसन दर में परिवर्तन, कला पारगम्यता में परिवर्तन, ऑक्सिन स्तर में परिवर्तन, RNA व प्रोटीन संश्लेषण में वृद्धि तथा अनेक एन्जाइमों (उदा. नाइट्रेट रिडक्टेज, पऑक्सिडेज, एमाइलेज आदि) का संश्लेषण व सक्रियता में वृद्धि तथा नियन्त्रक आदि फाइटोक्रोम मध्यस्थ प्रक्रियाएँ हैं।

ऑक्सिन के उपयोग– ऑक्सिन की पादप वृद्धि को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करने की प्रवृत्ति के कारण अनेक प्राकृतिक एवं संश्लेषित ऑक्सिनों का विभिन्न प्रकार से कृषि में उपयोग किया जाता है।

(1) धान्य फसलों में खरपतवार नाशी के रूप में 2, 4 D, 2, 4, 5-T तथा MCPA का उपयोग किया जाता है।

(2) पादपों में पुष्पन को प्रेरित करने के लिए-तम्बाकू, कपास, लीची व अन्नानास में NAA, IAA एवं 2, 4-D का उपयोग किया जाता है।

(3) तने की कटिंग में मूलारंभन हेतु NAA एवं IBA का उपयोग करते हैं।

(4) बीजांकुरण प्रेरण के लिए बीजों को IAA, IBA अथवा 2,4-D के विलयन में भिगोया जाता है। इससे प्रसुप्तावस्था को खत्म किया जा सकता है।

(5) अभिषेक फलन प्रेरण के लिए बैंगन के IBA उपचर के द्वारा अनिषेकफलन प्रेरित किया गया है।

(6) आलू में कन्द अंकुरण रोकने के लिए NAA का उपयोग किया जाता है।

(7) IBA, IPA तथा NAA द्वारा अनेक पादपों में फलन प्रेरित किया गया है।

(8) IAA, IBA, 2,4-D, 2,4,5-T इत्यादि के उपयोग से सेब, नाशपाती, अंगूर, नींबू, आम, संतरा इत्यादि फलों को समय पूर्व झड़ने से रोका जा सकता है।

जिब्बरेलिन के उपयोग – GA के वृद्धि प्रभावों के फलस्वरूप इनके कृषि में विभिन्न उपयोग हैं

(1) अंकुरण (Germination)— इनकी धान्य बीजों के अंकुरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मोरस (Morus indica) में GA से अंकुरण बढ़ जाता है।

(2) पुष्पन (Flowering)– अनेक पादपों में GA के उपयोग से प्रकाश के प्रभाव तथा निम्न ताप उपचार का प्रतिस्थापन किया गया है। मक्का में GA19, GA20, GA44 इत्यादि नर पुष्पों को मादी पुष्पों में परिवर्तन को प्रेरित करते हैं।

(3) अनिषेक फलन (Parthenocarpy)— सेब, नाशपाती, बैंगन इत्यादि में GA उपचार द्वारा अनिषेक फलन प्रेरित किया गया है। इससे फलों का आकार भी बड़ा होता है।

(4) सुषुप्तावस्था समाप्त करने के लिए (For breaking dormancy)- आलू में कन्द को GA उपचार से शीत काल में अंकुरण के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

(5) फलन (Fruiting)– अनेक पादपों में GA उपचार से फलों का बनना बढ़ जाता है। इससे फलों का आकार भी बढ़ता है। जैसे अंगूर, ग्रूइया एसिएटिका (Grewia asiatica) में।

(6) आनुवांशिक बौने पादपों का दीकरण (Elongation of geactically dwarf plants)— सामान्य पौधों पर GA उपचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता परन्तु आनुवांशिक स्तर पर जीनी संघटन के कारण बौने पादपों को GA उपचारित करने पर वे लम्बे हो जाते हैं। उदाहरण-मटर, टमाटर, कुकम्बर इत्यादि। गन्ने में भी लम्बाई बढ़ती है परन्तु तल शाखाओं में (tillers) की संख्या कम हो जाती है।

ईथाइलीन के उपयोग– ई थाइलीन पादप में अनेक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है अतः इसका कृषि क्षेत्र में काफी महत्व है। इसके लिए कुछ यौगिक जैसे ई थेफोन (ethephon) का उपयोग किया जाता है जो ईथरल (ethrel) के नाम से बाजार में उपलब्ध है तथा ई पाइलीन मोचित करता है। इनका निम्न क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है- (1) फलों (सेब, टमाटर) में पक्वन प्रेरण हेतु तथा नींबू में हरापन हटाने के लिए

(2) अन्नानास में समन्वित (synchronized) पुष्पन व फलन के लिए

(3) नियंत्रित वातावरण में फलों का संचय किया जाता है जहाँ ईथाइलीन का बनना रोका जा सके व फेलों के पक्वन को निलम्बित किया जा सके।


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